काठमांडू: नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के पीछे की भयावह ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसकी ऊर्जा हिरोशिमा में गिराए गए परमाणु बम के विस्फोट से भी ज्यादा बताई जा रही है। त्रिभुवन विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर डिजास्टर स्टडीज के निदेशक बसंत राज अधिकारी ने यह दावा किया है। उनके मुताबिक, ग्लेशियर और चट्टानों के बड़े हिस्से के नदी में गिरने के बाद जिस जलप्रलय ने जन्म लिया, उसकी ऊर्जा बेहद विनाशकारी थी। इस आपदा को वह अपने शोध करियर की अब तक की सबसे बड़ी घटनाओं में मानते हैं।
बसंत राज अधिकारी हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं और बाढ़ के खतरों के विशेषज्ञ हैं। उनका कहना है कि अब इस आपदा के पीछे की घटनाओं की तस्वीर काफी हद तक स्पष्ट हो चुकी है। पहाड़ से बर्फ और चट्टानों का बड़ा हिस्सा नीचे गिरकर नदी तक पहुंचा। इसके बाद बर्फ पिघलकर पानी में बदली और भारी मात्रा में पानी व मलबा तेज रफ्तार से नीचे की ओर बह निकला।
उत्तराखंड के चमोली की 2021 की आपदा से मिलती है घटना
अधिकारी के मुताबिक नेपाल में हुई यह घटना उत्तराखंड के चमोली में फरवरी 2021 में हुई आपदा से काफी मिलती-जुलती है। उन्होंने बताया कि ग्लेशियर और मलबे के नीचे आने से पैदा हुई ऊर्जा की गणना की गई, जो हिरोशिमा में हुए परमाणु विस्फोट से भी ज्यादा बताई गई है। उनके अनुसार इतने बड़े पैमाने पर ग्लेशियर के ढहने की आशंका पहले नहीं थी।
7 फरवरी 2021 को उत्तराखंड के चमोली में रोंटी पीक के उत्तरी हिस्से से करीब 2.7 करोड़ घन मीटर चट्टान और बर्फ का विशाल हिस्सा नीचे गिरा था। इसके बाद मलबा ऋषिगंगा और धौलीगंगा घाटियों की ओर तेजी से बढ़ा था।
1,400 मीटर की ऊंचाई से नीचे आया ग्लेशियर
त्रिभुवन विश्वविद्यालय के केंद्रीय जलविज्ञान एवं मौसम विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर दिबास श्रेष्ठ के मुताबिक, नेपाल में आई बाढ़ की शुरुआत लांगटांग घाटी में लिरुंग चोटी की उत्तरी ढलान पर ग्लेशियर के लटकते हिस्से के टूटने से हुई। ग्लेशियर का टूटा हुआ हिस्सा करीब 1,400 मीटर की ऊंचाई से लगभग सीधा नीचे गिरा।
इस घटना के दौरान अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के भूकंपीय उपकरणों ने जमीन में ऐसी हलचल दर्ज की थी, जिसे शुरुआत में भूकंप माना गया। लेकिन बाद में भूकंपीय आंकड़ों के विश्लेषण से सामने आया कि 5.2 तीव्रता की यह हलचल ग्लेशियर के ढहने और उसके बाद नीचे आए मलबे से जुड़ी थी।
मानसून के बीच पहाड़ों में बढ़ा तापमान बना खतरा
काठमांडू विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रमुख रिजन भक्त ने बताया कि नेपाल में इस समय मानसून का दौर है, लेकिन जिस इलाके में यह घटना हुई वहां बहुत ज्यादा बारिश नहीं हुई थी। इसके बावजूद पहाड़ी क्षेत्र में तापमान काफी अधिक था। विशेषज्ञों के अनुसार ज्यादा तापमान बर्फ के तेजी से पिघलने की वजह बनता है, जिससे ग्लेशियरों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
