बंदूक बनाम बुलंद हौसला : बलूचिस्तान में डॉ. माहरंग बलोच के सामने क्यों बेबस है जनरल मुनीर की सेना?

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धनंजय सिंह

नई दिल्ली। बलूचिस्तान के पथरीले पहाड़ों और तपते रेगिस्तानों से उठी एक आवाज ने आज पाकिस्तान के सबसे शक्तिशाली संस्थान—रावलपिंडी के सैन्य मुख्यालय (GHQ)—की नीदें उड़ा रखी हैं। यह आवाज किसी बंदूकधारी विद्रोही की नहीं, बल्कि 30 साल की एक युवा महिला डॉक्टर की है, जिसका नाम है डॉ. माहरंग बलोच।

हालिया महीनों में बलूचिस्तान के कोने-कोने में हुए अभूतपूर्व विरोध प्रदर्शनों और बलोच यकजेहती कमेटी (BYC) के बढ़ते प्रभाव ने यह साफ कर दिया है कि आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर की अत्याधुनिक हथियारों से लैस सेना के पास इस निहत्थे और शांतिपूर्ण आंदोलन का कोई जवाब नहीं है।

पिता की शहादत से उपजा प्रतिरोध का नया चेहरा

डॉ. माहरंग बलोच की कहानी बलूचिस्तान के हर दूसरे घर की कहानी है। साल 2009 में उनके पिता गफ्फार लांगो को सुरक्षा बलों द्वारा जबरन गायब (Enforced Disappearance) कर दिया गया था, और 2011 में उनका क्षत-विक्षत शव मिला। सेना को लगा था कि वह एक और बलोच आवाज को दबाने में कामयाब रही, लेकिन उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि उन्होंने एक ऐसी नेत्री को जन्म दे दिया है जो आगे चलकर उनके पूरे दमनकारी तंत्र को चुनौती देगी।

क्यों कांपती है मुनीर की सेना?

‘स्टेट नैरेटिव’ का पूरी तरह फेल होना: दशकों से पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान के हर आंदोलन को ‘विदेशी साजिश’ या ‘आतंकवाद’ का ठप्पा लगाकर कुचलती आई है। लेकिन माहरंग बलोच ने हथियारों की जगह ‘शांतिपूर्ण सत्याग्रह’ और संविधान को अपना हथियार बनाया। जब हजारों की संख्या में महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग हाथों में अपने लापता परिजनों की तस्वीरें लेकर सड़कों पर बैठते हैं, तो सेना का ‘आतंकवाद’ वाला नैरेटिव पूरी दुनिया के सामने ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है।

बलोच महिलाओं का ‘शील्ड’ बनना

माहरंग बलोच ने बलूचिस्तान के इतिहास में पहली बार महिलाओं को आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर दिया है। बलोच समाज में महिलाओं पर हाथ उठाना बेहद संवेदनशील माना जाता है। जब भी मुनीर की पुलिस या अर्धसैनिक बल (FC) इन महिलाओं पर लाठियां भांजते हैं, तो उसकी तस्वीरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया और मानवाधिकार संगठनों में पाकिस्तान की थू-थू करा देती हैं।

सेंसरशिप की दीवारें ढही

पाकिस्तानी सेना ने बलूचिस्तान में मीडिया ब्लैकआउट कर रखा है। वहां की स्थानीय खबरों को मुख्यधारा के टीवी चैनलों पर दिखाने की सख्त मनाही है। लेकिन माहरंग और उनके समर्थकों ने सोशल मीडिया (X, इंस्टाग्राम) का ऐसा डिजिटल चक्रव्यूह रचा है कि आज संयुक्त राष्ट्र (UN) से लेकर एमनेस्टी इंटरनेशनल तक बलूचिस्तान के ‘मिसिंग पर्सन्स’ के मुद्दे पर जनरल मुनीर से सीधे सवाल पूछ रहे हैं।

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डराने-धमकाने की रणनीति हुई बेअसर

जनरल मुनीर की सेना ने माहरंग को रोकने के लिए हर हथकंडा अपनाया—उन पर देशद्रोह के दर्जनों मुकदमे दर्ज किए गए, उनका नाम ‘नो फ्लाई लिस्ट’ में डालकर विदेश जाने से रोका गया, और उनके साथियों को गिरफ्तार किया गया। लेकिन इन सब कार्रवाइयों ने माहरंग को बलोच जनता की नजरों में एक ‘लिविंग लेजेंड’ (जीवंत नायक) बना दिया है। अब हालत यह है कि सेना उन्हें गिरफ्तार करने से भी डरती है, क्योंकि उन्हें पता है कि माहरंग की गिरफ्तारी पूरे बलूचिस्तान को आग की भट्टी में झोंक देगी।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान अलग-थलग
राजनयिक विशेषज्ञों का मानना है कि जनरल आसिम मुनीर इस समय दोहरे दबाव में हैं। एक तरफ चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के तहत बलूचिस्तान में चीनी परियोजनाओं को सुरक्षित रखना है, तो दूसरी तरफ माहरंग बलोच के आंदोलन के कारण स्थानीय जनता में चीन के खिलाफ गुस्सा चरम पर है। सेना न तो बलोच जनता का दिल जीत पा रही है और न ही बल प्रयोग कर पा रही है।

बलोच विश्लेषकों का कहना है

“जनरल मुनीर के पास कितनी भी फौज हो, लेकिन नैतिक रूप से वह माहरंग बलोच से हार चुके हैं। बंदूक की ताकत हमेशा हौसले के सामने छोटी पड़ जाती है, और यही कारण है कि आज रावलपिंडी के जनरलों के माथे पर शिकन है।”

बलूचिस्तान अब उस मोड़ पर आ चुका है जहां दमन की पुरानी नीतियां काम नहीं कर रही हैं, और डॉ. माहरंग बलोच के नेतृत्व में यह नया ‘बलोच वसंत’ (Baloch Spring) मुनीर की सेना के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुका है।

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