मुंबई: वास्तविक घटनाओं और चर्चित किरदारों पर फिल्म बनाना हमेशा चुनौतीपूर्ण होता है। निर्देशक तिग्मांशु धूलिया इसी तरह की कहानियों के लिए जाने जाते हैं। उनकी नई फिल्म ‘घमासान’ भी बुंदेलखंड के चर्चित डाकू ददुआ से प्रेरित है। फिल्म में अरशद वारसी और प्रतीक गांधी मुख्य भूमिकाओं में नजर आए हैं। दोनों कलाकारों के अभिनय ने फिल्म को मजबूती दी है, लेकिन कहानी और पटकथा के स्तर पर कुछ कमियां भी दिखाई देती हैं।
क्या है ‘घमासान’ की कहानी?
फिल्म की कहानी साल 2006 में उत्तर प्रदेश की एक शादी से शुरू होती है। एक युवक अपने पिता को छोड़कर अपनी पत्नी और मां के साथ दिल्ली चला जाता है। उसका पिता बुंदेलखंड के डाकू महाराज के लिए काम करता है और पुलिस का मुखबिर बनने के लिए कहा जाता है। जब यह बात महाराज को पता चलती है तो वह बेहद क्रूर कदम उठाता है और युवक के पिता की हत्या कर उसका सिर बेटे के घर के बाहर पहुंचा देता है।
इसके बाद बेटा अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए हथियार उठा लेता है। इसी के साथ महाराज की बेरहमी और उसके प्रभाव का अंदाजा होता है। वह सिर्फ जंगलों में सक्रिय डाकू नहीं है, बल्कि राजनीति में भी अपनी पकड़ रखता है।
बुंदेलखंड में चुनाव के दौरान महाराज चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित न कर सके, इसके लिए स्पेशल टास्क फोर्स के अधिकारी आदित्य सिंह को जिम्मेदारी दी जाती है। प्रतीक गांधी इस किरदार में नजर आए हैं। इसके बाद कहानी महाराज को रोकने की कोशिश और उसके खिलाफ चलने वाले अभियान के इर्द-गिर्द आगे बढ़ती है।
कमजोर पटकथा से प्रभावित हुई कहानी
राम यश सिंह और पीयूष सिंह की कहानी का मूल विचार मजबूत है, लेकिन कमजोर पटकथा इसकी पूरी क्षमता को पर्दे पर नहीं ला पाती। तिग्मांशु धूलिया इससे पहले डाकुओं की दुनिया पर आधारित फिल्म ‘पान सिंह तोमर’ जैसी चर्चित फिल्म बना चुके हैं, जिसके स्तर को ‘घमासान’ छू नहीं पाती।
फिल्म में डाकुओं की क्रूरता, जंगलों में उनका जीवन, मुखबिरों का नेटवर्क और गांवों में उनके आतंक को दिखाया गया है, लेकिन इन पहलुओं में कुछ नया नजर नहीं आता। डाकुओं पर बनी कई फिल्मों में दर्शक इस तरह के दृश्य पहले भी देख चुके हैं।
रोमांच की कमी महसूस होती है
फिल्म की कहानी लगातार एक ही दिशा में आगे बढ़ती है और इसमें ऐसे बड़े मोड़ कम देखने को मिलते हैं जो दर्शकों को चौंका सकें। हालांकि तिग्मांशु धूलिया का निर्देशन कलाकारों के प्रदर्शन को संभालता है और कहानी को जरूरत से ज्यादा नाटकीय नहीं बनने देता।
संगीत ने संभाला फिल्म का माहौल
फिल्म का संगीत इसकी कहानी और उत्तर प्रदेश के परिवेश के साथ जुड़ा हुआ महसूस होता है। अनुज गर्ग का संगीत माहौल बनाने में मदद करता है, जबकि सिद्धार्थ पंडित और रेव शेरगिल का बैकग्राउंड स्कोर धीमी रफ्तार वाली कहानी में दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखता है।
सिनेमैटोग्राफी बनी फिल्म की ताकत
गांवों और जंगलों में फिल्माई गई ‘घमासान’ की सिनेमैटोग्राफी प्रभाव छोड़ती है। देव अग्रवाल ने लोकेशन और माहौल को पर्दे पर विश्वसनीय तरीके से पेश किया है। हालांकि फिल्म में ऐसे संवादों की कमी है जो लंबे समय तक याद रह जाएं, लेकिन एसटीएफ टीम द्वारा महाराज और उसके गैंग को पकड़ने की रणनीति वाले दृश्य प्रभावी बन पड़े हैं।
अरशद वारसी और प्रतीक गांधी का शानदार प्रदर्शन
कॉमेडी किरदारों के लिए पहचाने जाने वाले अरशद वारसी पिछले कुछ समय से गंभीर भूमिकाओं में भी अपनी अलग पहचान बना रहे हैं। उन्होंने महाराज के किरदार को पूरी गंभीरता के साथ निभाया है। हालांकि उनके स्तर को देखते हुए दर्शकों की उम्मीदें हमेशा ज्यादा रहती हैं।
वहीं प्रतीक गांधी ने स्पेशल टास्क फोर्स अधिकारी आदित्य सिंह के किरदार में प्रभाव छोड़ा है। पत्नी के सामने सहज और अपराधियों के सामने सख्त अधिकारी की भूमिका में वह फिट बैठते हैं। डाकू के सप्लायर के किरदार में राजपाल यादव भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। इशिता के हिस्से सीमित दृश्य आए हैं, जबकि फिल्म की सहायक कलाकारों की टीम ने भी अच्छा काम किया है।
