नई दिल्ली: अगस्त 2026 में दुनिया का औसत तापमान औद्योगिक क्रांति से पहले के दौर की तुलना में 1.65 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया। यूरोपीय संघ की जलवायु एजेंसी कॉपरनिकस के अनुसार, अगस्त और जुलाई 2023 संयुक्त रूप से अब तक दर्ज किए गए सबसे गर्म महीनों में रहे। अगस्त का तापमान उस 1.5 डिग्री सेल्सियस सीमा से भी ऊपर रहा, जिसे जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों को सीमित करने के लिए अहम माना जाता है।
हालांकि, किसी एक महीने का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंचना इस बात का संकेत नहीं है कि यह सीमा स्थायी रूप से पार हो चुकी है। इसके बावजूद वैज्ञानिक इसे लगातार बढ़ते वैश्विक तापमान और जलवायु संकट के गंभीर संकेत के तौर पर देख रहे हैं। मौजूदा गर्मी के पीछे जलवायु परिवर्तन के साथ अल नीनो को भी प्रमुख कारण माना जा रहा है।
अल नीनो प्रशांत महासागर में होने वाली प्राकृतिक जलवायु घटना है। इस दौरान पूर्वी प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। समुद्र में जमा अतिरिक्त गर्मी वातावरण में पहुंचने से वैश्विक तापमान पर असर पड़ता है, जो करीब एक साल तक बना रह सकता है।
अगले एक साल में और बढ़ सकती है गर्मी
कॉपरनिकस के वैज्ञानिकों के मुताबिक, मौजूदा अल नीनो अभी मजबूत हो रहा है और यह अब तक की सबसे शक्तिशाली घटनाओं में शामिल हो सकता है। इसका वैश्विक तापमान पर सबसे अधिक प्रभाव अगले एक साल के दौरान देखने को मिल सकता है। ऐसे में आने वाले समय में गर्मी के नए रिकॉर्ड बनने की आशंका भी जताई जा रही है।
पश्चिमी यूरोप में दर्ज हुई सबसे गर्म गर्मी
अगस्त के दौरान पश्चिमी यूरोप ने भी अब तक की सबसे गर्म गर्मी दर्ज की। ब्रिटेन में 1884 से मौसम संबंधी रिकॉर्ड शुरू होने के बाद यह सबसे गर्म गर्मी रही। ब्रिटेन के मौसम विभाग के मुताबिक, मानव गतिविधियों के कारण हो रहे जलवायु परिवर्तन ने इस तरह की गर्मी पड़ने की संभावना करीब 130 गुना बढ़ा दी है।
इस असाधारण गर्मी का असर आम जनजीवन पर भी पड़ा। कई जगह स्कूलों का काम प्रभावित हुआ, अस्पतालों पर दबाव बढ़ा, खेती को नुकसान पहुंचा और जंगलों में आग तथा सूखे की घटनाओं में वृद्धि देखने को मिली।
यूरोप में गर्मी से हजारों मौतों का दावा
वैज्ञानिकों के मुताबिक, ब्रिटेन और यूरोप में अत्यधिक गर्मी के कारण दसियों हजार लोगों की मौत हुई। कॉपरनिकस की डॉ. सामंथा बर्गेस ने अगस्त को वैश्विक जलवायु रिकॉर्ड में असाधारण महीना बताया।
संयुक्त राष्ट्र के जलवायु प्रमुख साइमन स्टील ने इन रिकॉर्ड तापमानों को जीवाश्म ईंधन पर मानव निर्भरता से पैदा हो रहे जलवायु संकट का स्पष्ट संकेत बताया। वहीं, इंपीरियल कॉलेज लंदन की डॉ. क्लेयर बार्न्स ने कहा कि ऐसी गर्मी को सामान्य मानकर स्वीकार करना उचित नहीं होगा। उनके मुताबिक, जब तक जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल जारी रहेगा, तापमान के रिकॉर्ड टूटते रहेंगे और स्थिति और गंभीर हो सकती है।
