लखनऊ: समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर अपनी रणनीति को नया स्वरूप देना शुरू कर दिया है। पार्टी अब ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को और विस्तार देने की तैयारी में है। इस रणनीति के तहत आरक्षित सीटों के साथ-साथ सामान्य विधानसभा सीटों पर भी बड़ी संख्या में दलित उम्मीदवार उतारने की योजना बनाई जा रही है। माना जा रहा है कि पार्टी 100 से अधिक दलित और आदिवासी प्रत्याशियों को मैदान में उतारने पर विचार कर रही है।
सामान्य सीटों पर भी मिलेगा दलितों को मौका
सूत्रों के मुताबिक, समाजवादी पार्टी इस बार सामान्य सीटों पर भी 15 से 20 दलित उम्मीदवारों को टिकट देने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी का मानना है कि इससे दलित समुदाय में राजनीतिक भागीदारी का संदेश जाएगा और आसपास की विधानसभा सीटों पर भी इसका चुनावी प्रभाव पड़ सकता है।
2024 के फॉर्मूले को आगे बढ़ाने की तैयारी
लोकसभा चुनाव 2024 में पीडीए फॉर्मूले के जरिए मिले राजनीतिक लाभ को देखते हुए पार्टी अब इसी सामाजिक समीकरण को विधानसभा चुनाव में और मजबूत करना चाहती है। पार्टी की कोशिश है कि दलित और गैर-यादव पिछड़े वर्ग के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाई जाए और व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार किया जाए।
2022 के मुकाबले बड़ा बदलाव
विधानसभा चुनाव 2022 में समाजवादी पार्टी ने आरक्षित सीटों के अलावा केवल तीन सामान्य सीटों पर दलित उम्मीदवार उतारे थे। लेकिन इस बार पार्टी पहले की तुलना में कहीं अधिक दलित चेहरों को चुनावी मैदान में उतारने की तैयारी कर रही है। उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में 84 सीटें अनुसूचित जाति और दो सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं।
भाजपा की सामाजिक रणनीति को चुनौती देने की कोशिश
सपा का लक्ष्य भाजपा के गैर-यादव पिछड़ा और गैर-जाटव दलित सामाजिक समीकरण को चुनौती देना भी है। पार्टी मानती है कि इस वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत कर वह चुनावी मुकाबले को अपने पक्ष में मोड़ सकती है। साथ ही बसपा के कमजोर पड़ने के बाद नए राजनीतिक विकल्प की तलाश कर रहे दलित मतदाताओं को भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
भाजपा भी सक्रिय, दलित वोट बैंक पर नजर
दूसरी ओर भाजपा भी दलित वर्ग में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए लगातार अभियान चला रही है। संत रविदास समरसता संकल्प अभियान और भदोही का नाम दोबारा संत रविदास नगर करने की घोषणा को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। ऐसे में 2027 के चुनाव से पहले दलित वोट बैंक को लेकर दोनों प्रमुख दलों के बीच राजनीतिक मुकाबला और तेज होने के संकेत हैं।
