गोरखपुर एम्स में इंसानियत की मिसाल, मृत समझकर छोड़ गए परिजन; डॉक्टरों ने 98 दिन तक किया इलाज और युवती को नई जिंदगी देकर घर भेजा

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर एम्स से मानवता और समर्पण की एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसने हर किसी को भावुक कर दिया। यहां डॉक्टरों ने एक 20 वर्षीय युवती का लगातार 98 दिनों तक इलाज किया, उसका पूरा खर्च उठाया और आखिरकार उसे पूरी तरह स्वस्थ कर उसके परिवार के पास भेज दिया। हैरानी की बात यह रही कि युवती के परिजन उसे मृत समझकर अस्पताल में छोड़कर चले गए थे।

कीटनाशक खाने के बाद गंभीर हालत में पहुंची थी युवती

गोरखपुर एम्स के ऑर्थो विभाग के डॉक्टर अरुण कुमार पांडेय के मुताबिक, कुशीनगर जिले की रहने वाली युवती ने कीटनाशक पदार्थ यानी फॉस्फोरस खा लिया था। 19 जनवरी को परिजन उसे गंभीर हालत में एम्स लेकर पहुंचे थे। शुरुआती जानकारी में पता चला कि युवती ने जहरीला पदार्थ खाया है।

परिवार पहले उसे स्थानीय डॉक्टरों के पास लेकर गया था, जहां से हालत गंभीर होने पर गोरखपुर एम्स रेफर कर दिया गया। अस्पताल में भर्ती करने के बाद डॉक्टरों ने तुरंत इलाज शुरू किया, लेकिन करीब एक सप्ताह बाद उसकी हालत और बिगड़ गई, जिसके बाद उसे आईसीयू में भर्ती करना पड़ा।

मृत समझकर अस्पताल से भाग गए थे परिजन

डॉक्टरों के अनुसार, जब युवती की स्थिति बेहद नाजुक हो गई तो उसके परिजन उसे मृत समझ बैठे और अस्पताल छोड़कर चले गए। परिवार को डर था कि कहीं मामला पुलिस तक न पहुंच जाए। हालांकि, इसके बावजूद एम्स प्रशासन और डॉक्टरों की टीम ने हार नहीं मानी और युवती की जान बचाने के लिए लगातार संघर्ष जारी रखा।

48 दिन वेंटिलेटर पर रही, तीन बार पड़ा दिल का दौरा

युवती को ट्रॉमा सेंटर के मेडिकल आईसीयू में भर्ती कर इलाज शुरू किया गया। चेस्ट फिजिशियन डॉ. अरविंद कुमार और एनेस्थीसिया विभाग के डॉक्टर सुहास मल्ल की निगरानी में वह करीब 48 दिनों तक वेंटिलेटर पर रही।

इलाज के दौरान युवती को तीन बार दिल का दौरा भी पड़ा, लेकिन हर बार डॉक्टरों ने सीपीआर देकर उसकी जान बचा ली। इस पूरी प्रक्रिया में डॉ. सुब्रमणियम, डॉ. अनिल मीना, डॉ. शशि सिंह, डॉ. श्रीशा और डॉ. अरुण कुमार पांडेय समेत कई डॉक्टर लगातार उसकी देखभाल में जुटे रहे।

98 दिनों की जद्दोजहद के बाद मिली नई जिंदगी

डॉक्टर अरुण कुमार पांडेय ने बताया कि ट्रॉमा सेंटर की टीम ने करीब 98 दिनों तक लगातार इलाज और निगरानी के बाद युवती को पूरी तरह स्वस्थ कर दिया। 26 अप्रैल को युवती अपने परिजनों के साथ खुद चलकर अस्पताल से घर गई।

बाद में जब परिवार से पूछा गया कि वे अस्पताल छोड़कर क्यों चले गए थे, तो उन्होंने बताया कि उन्हें लगा था युवती की मौत हो चुकी है और पुलिस कार्रवाई के डर से वे वहां से भाग गए थे।

एम्स प्रशासन और डॉक्टरों ने उठाया पूरा खर्च

इस पूरे इलाज के दौरान युवती का सारा खर्च एम्स प्रशासन और डॉक्टरों ने मिलकर उठाया। डॉक्टरों का कहना है कि अस्पताल के सभी विभागों और स्टाफ ने मिलकर युवती की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई। यही वजह रही कि लगभग तीन महीने तक जिंदगी और मौत से जूझने के बाद युवती पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने घर लौट सकी।

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