नई दिल्ली: जीवन में उम्र कभी भी आपके सपनों और उपलब्धियों के आड़े नहीं आ सकती, इस बात को दुनिया के महान सांख्यिकीविद् (Statistician) सी. राधाकृष्ण राव ने एक बार फिर साबित कर दिया है।
भारत में 60 वर्ष की पारंपरिक उम्र में सेवानिवृत्त होने के बाद भी सी. राधाकृष्ण राव ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी दूसरी पारी की शुरुआत अमेरिका से की, जहाँ उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत और प्रतिभा के दम पर एक बार फिर दुनिया को हैरान कर दिया:
62 वर्ष की आयु: पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय में सांख्यिकी के प्रोफेसर बने।
70 वर्ष की आयु: पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष (Head of Department) का पद संभाला।
75 वर्ष की आयु: अमेरिका की नागरिकता प्राप्त की।
82 वर्ष की आयु: अमेरिका के प्रतिष्ठित ‘विज्ञान के राष्ट्रीय पदक’ (National Medal of Science) और व्हाइट हाउस सम्मान से नवाजे गए।
102 वर्ष की आयु: सांख्यिकी के क्षेत्र में सर्वोच्च अंतरराष्ट्रीय सम्मान—नोबेल पुरस्कार (या समकक्ष अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार) प्राप्त कर इतिहास रच दिया।
भारत में मिला था सर्वोच्च सम्मान
अपनी मातृभूमि के प्रति उनके योगदान को याद रखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पहले ही देश के दो सर्वोच्च नागरिक सम्मानों—पद्म भूषण (1968) और पद्म विभूषण (2001) से सम्मानित किया था।
“रिटायरमेंट का अर्थ निष्क्रिय होना नहीं”
सी. राधाकृष्ण राव का यह जीवन परिचय इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि सेवानिवृत्ति (Retirement) का अर्थ जीवन का अंत या निष्क्रिय हो जाना नहीं है। उनका यह संदेश आज की पीढ़ी के लिए एक बड़ी सीख है कि जीवन का असली नाम आखिरी सांस तक पूरे उत्साह, ऊर्जा और जुनून के साथ जीना है। उनकी यह उपलब्धि पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बन गई है जो यह सिखाती है कि उम्र सिर्फ एक संख्या है।
