ढाका/रियाद। सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच हाल ही में हस्ताक्षरित ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौते’ को लेकर वैश्विक स्तर पर सामरिक और रणनीतिक भ्रम की स्थिति बनी हुई है। तीनों देशों द्वारा इसे एक व्यापक रक्षा समझौते के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, किसी एक देश पर हमला होने की स्थिति में अन्य देश किस तरह और किन शर्तों के तहत रक्षा करेंगे, इसके नियम और शर्तें अभी पूरी तरह से सार्वजनिक नहीं की गई हैं।
गठबंधन का विस्तार करने में जुटे संस्थापक देश
रक्षा विश्लेषक इस समझौते की तुलना पश्चिमी सैन्य संगठन नाटो (NATO) से कर रहे हैं और इसे ‘इस्लामिक नाटो’ का नाम दे रहे हैं। समझौते की अस्पष्टता के बावजूद, इसमें शामिल तीनों देश अन्य मुस्लिम बहुल राष्ट्रों को इस सुरक्षा ढांचे में शामिल करने के लिए सक्रिय कूटनीतिक प्रयास कर रहे हैं।
बांग्लादेश की बढ़ी दिलचस्पी
इस त्रिपक्षीय गठबंधन में शामिल होने वाले संभावित देशों में सबसे नया नाम भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश का है। बांग्लादेश ने मक्का समझौते और इसके सुरक्षा प्रारूप में गहरी रुचि दिखाई है। हालांकि, ढाका की तरफ से अभी तक यह आधिकारिक रूप से स्पष्ट नहीं किया गया है कि वह औपचारिक तौर पर इस गठबंधन का हिस्सा बनेगा या नहीं।
मक्का समझौते से जुड़े प्रमुख पहलू
रक्षा साझेदारी का दायरा: समझौते के तहत सैन्य तकनीक के आदान-प्रदान, संयुक्त सैन्य अभ्यास और खुफिया जानकारी साझा करने पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।
बांग्लादेश का रुख: बांग्लादेश अपनी रक्षा जरूरतों के आधुनिकीकरण और मध्य पूर्व के देशों के साथ रणनीतिक संतुलन बनाने के उद्देश्य से इस गठबंधन को देख रहा है।
सामरिक संतुलन पर असर: यदि बांग्लादेश इस समझौते का हिस्सा बनता है, तो दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है।
शर्तों पर संशय बरकरार: सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक इस समझौते के अंतिम नियम और ‘सामूहिक रक्षा’ (Collective Defense) की शर्तें पूरी तरह सामने नहीं आतीं, तब तक इसकी प्रभावशीलता पर अनिश्चितता बनी रहेगी।
