नई दिल्ली: भाद्रपद महीने की अमावस्या तिथि को मनाई जाने वाली पिठोरी अमावस्या धार्मिक दृष्टि से बेहद खास मानी जाती है। इस दिन जहां पितरों के तर्पण और स्नान-दान की परंपरा निभाई जाती है, वहीं माताएं अपनी संतान की सुख-समृद्धि, लंबी आयु और खुशहाल जीवन की कामना से व्रत रखती हैं। पिठोरी अमावस्या को कुशग्रहणी अमावस्या भी कहा जाता है और इस दिन कुशा, 64 योगिनियों की पूजा और विशेष अनुष्ठानों का महत्व बताया गया है।
कब मनाई जाएगी पिठोरी अमावस्या 2026
पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में अमावस्या तिथि 10 सितंबर की सुबह 10 बजकर 33 मिनट से शुरू होगी और 11 सितंबर की सुबह 8 बजकर 56 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर पिठोरी अमावस्या का पर्व 10 सितंबर को मनाया जाएगा।
इस दिन स्नान और दान के लिए सुबह 4 बजकर 31 मिनट से 5 बजकर 17 मिनट तक का समय शुभ बताया गया है। वहीं पूजा के लिए सुबह 6 बजकर 7 मिनट से 9 बजकर 18 मिनट तक का समय विशेष माना गया है।
कुशा के कारण खास मानी जाती है यह अमावस्या
पिठोरी अमावस्या को कुशग्रहणी अमावस्या भी कहा जाता है। इस दिन कुशा घास का विशेष महत्व होता है। धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ, तर्पण और अन्य कर्मकांडों में कुशा का उपयोग किया जाता है।
मान्यता है कि इस दिन एकत्र की गई कुशा का इस्तेमाल पूरे साल धार्मिक कार्यों में किया जाता है। कुशा पतली, लंबी और नुकीली होती है, जो गुच्छों के रूप में उगती है।
आटे से बनाई जाती हैं 64 योगिनियों की आकृतियां
पिठोरी अमावस्या की पूजा में 64 योगिनियों और सप्तमातृकाओं के पूजन की परंपरा है। इसके लिए चावल के आटे से इनकी प्रतीकात्मक आकृतियां बनाई जाती हैं और उन्हें लाल कपड़े पर स्थापित किया जाता है।
पूजा की शुरुआत भगवान गणेश के पूजन से की जाती है। इसके बाद रोली, हल्दी, कुमकुम, दूर्वा, लाल फूल और सुहाग से जुड़ी सामग्री अर्पित कर पूजा संपन्न की जाती है।
घर में बनाए जाते हैं विशेष पकवान, लगाया जाता है भोग
पिठोरी अमावस्या की पूजा में विशेष पकवान बनाने की भी परंपरा है। इस दिन आटे से बने व्यंजन, खीर और पूरी का भोग लगाया जाता है। इसके बाद व्रत कथा सुनी जाती है और आरती की जाती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस पूजा से परिवार में सुख-समृद्धि और संतान के कल्याण की कामना पूरी होने की मान्यता है।
पितरों के तर्पण और पिंडदान के लिए भी महत्वपूर्ण दिन
अमावस्या तिथि होने के कारण पिठोरी अमावस्या पर पितरों का स्मरण और तर्पण भी किया जाता है। इस दिन पितरों की शांति के लिए तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है।
10 सितंबर को पितृ तर्पण और पिंडदान के लिए सुबह 11 बजकर 45 मिनट से दोपहर 1 बजकर 30 मिनट तक का समय शुभ बताया गया है।
पीपल पूजा से जुड़ी है विशेष मान्यता
पिठोरी अमावस्या के दिन पीपल के पेड़ की पूजा करने की भी परंपरा है। मान्यता है कि पीपल पर जल अर्पित करने और उसके नीचे पितरों के नाम दीपक जलाने से पितरों को शांति मिलती है।
