नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोलने के लिए विपक्षी दल एक मंच पर जरूर आ गए हैं, लेकिन आगामी विधानसभा चुनावों में भी क्या यह एकजुटता कायम रह पाएगी? दिल्ली के रामलीला मैदान में रविवार को आयोजित ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ रैली में इंडिया गठबंधन ने एकजुटता का संदेश दिया। विपक्षी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग उठाई और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के मुद्दे पर सरकार को घेरा। हालांकि, अलग-अलग राज्यों में चुनावी समीकरण और सीटों को लेकर घटक दलों के बीच जारी खींचतान गठबंधन की एकता पर सवाल खड़े कर रही है। ऐसे में विपक्ष को साथ रखने की चुनौती राहुल गांधी के सामने भी है।
रैली में एकजुटता, लेकिन राज्यों में अलग-अलग राह
रामलीला मैदान की रैली में विपक्षी दलों के नेता एक साथ नजर आए। मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के मुद्दे पर सभी ने एकजुट होकर आवाज उठाई। लेकिन चुनावी राजनीति में यही दल कई राज्यों में एक-दूसरे के सामने खड़े दिखाई देते हैं।
उत्तर प्रदेश में कुछ महीनों बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं, लेकिन सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों दलों के बीच खींचतान जारी है। राजनीतिक रणनीतिकारों का मानना है कि केंद्र सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ साझा विरोध के साथ-साथ घटक दलों को चुनाव में भी तालमेल दिखाना होगा।
कई राज्यों में गठबंधन के सहयोगी ही आमने-सामने
विपक्षी एकता के सामने सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग राज्यों के राजनीतिक समीकरण हैं। केरल में वामपंथी दलों और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के अलग चुनाव लड़ने से तृणमूल कांग्रेस को कई सीटों पर नुकसान उठाना पड़ा था।
आम आदमी पार्टी फिलहाल इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं है। वहीं, 2022 के गुजरात विधानसभा चुनाव में आप की मौजूदगी के चलते कांग्रेस को कई सीटों पर नुकसान होने की बात कही गई थी। ऐसे उदाहरणों से साफ है कि विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा गठबंधन की एकजुटता को कमजोर कर सकती है।
साझा नेतृत्व और चुनावी एजेंडे पर सहमति जरूरी
चुनावी रणनीतिकारों का मानना है कि इंडिया गठबंधन को केवल एसआईआर और अन्य साझा मुद्दों पर विरोध तक सीमित नहीं रहना चाहिए। गठबंधन के नेतृत्व, साझा एजेंडे और चुनावी रणनीति पर भी स्पष्ट सहमति बनानी होगी।
अगर विपक्षी दल चुनाव के दौरान एक-दूसरे के खिलाफ उम्मीदवार उतारते हैं और मतों का बंटवारा होता है, तो इसका सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है। इसलिए विपक्ष के सामने चुनौती केवल एक मंच पर आने की नहीं, बल्कि चुनावी मैदान में भी साथ चलने की है।
राहुल गांधी ने शिव बारात का उदाहरण देकर दिया एकजुटता का संदेश
रैली के दौरान राहुल गांधी ने शिव बारात का उदाहरण देते हुए कहा कि भगवान शिव की बारात में कोई भी शामिल हो सकता है और उसमें कोई भी नाच सकता है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता किशोर कुमार झा के मुताबिक, राहुल के इस बयान से संकेत मिलता है कि लंबी राजनीतिक लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने के लिए सभी दलों और वर्गों की भागीदारी जरूरी है।
रैली के जरिए विपक्षी कुनबा बढ़ाने की कोशिश
‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ रैली के जरिए इंडिया गठबंधन ने अपने दायरे को व्यापक बनाने के संकेत भी दिए। इस दौरान क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक मजबूरियां और नए समीकरण बनाने की कोशिशें भी दिखाई दीं।
तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने वामपंथी दलों, युवाओं और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के साथ एकजुटता जताई। उन्होंने कहा कि इस लड़ाई को सभी को मिलकर लड़ना होगा। ममता के इस रुख को सीजेपी के आंदोलन से जुड़ने की संभावनाओं के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है।
इससे एक दिन पहले सीजेपी के अभिजीत दीपके ने ममता बनर्जी से मुलाकात की थी। ऐसे में विपक्षी दलों की कोशिश अपने साथ नए राजनीतिक और सामाजिक समूहों को जोड़ने की भी नजर आ रही है।
