पेट्रोल-डीजल की कीमतों में मई में लगी आग, जबकि तेल कंपनियों ने कमाए ₹77,280 करोड़! जानिए मुनाफे और महंगाई के पीछे की पूरी कहानी

नई दिल्ली: मई का महीना देशभर के उपभोक्ताओं के लिए महंगाई का नया झटका लेकर आया। कुछ ही दिनों के भीतर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कई बार बढ़ोतरी हुई, जिसके बाद कई शहरों में ईंधन के दाम करीब ₹7.50 प्रति लीटर तक बढ़ गए। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पेट्रोल की कीमत एक बार फिर ₹100 प्रति लीटर के पार पहुंच गई है। ऐसे में आम लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सरकारी तेल कंपनियां रिकॉर्ड मुनाफा कमा रही हैं तो फिर ईंधन महंगा क्यों किया जा रहा है।

देश की तीन प्रमुख सरकारी तेल कंपनियों—इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम—ने हाल ही में अपने तिमाही और वार्षिक वित्तीय नतीजे जारी किए हैं। इन आंकड़ों के अनुसार तीनों कंपनियों ने वित्त वर्ष 2025-26 में मिलकर करीब ₹77,280 करोड़ का शुद्ध मुनाफा अर्जित किया। इसके बावजूद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार वृद्धि ने उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है।

रिकॉर्ड मुनाफे की असली वजह क्या है?

विशेषज्ञों के अनुसार कंपनियों की बैलेंस शीट में दिखाई दे रहा भारी मुनाफा वर्तमान परिस्थितियों का नहीं, बल्कि पिछले महीनों का परिणाम है। वित्त वर्ष 2025-26 की अंतिम तिमाही और पूरे साल के दौरान कंपनियों को इन्वेंट्री गेन का बड़ा फायदा मिला।

जब फरवरी और मार्च के दौरान पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगभग 65-70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 110-115 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं, तब भारतीय तेल कंपनियों के पास पहले से खरीदा गया सस्ता कच्चा तेल बड़ी मात्रा में भंडारित था। कंपनियों ने उसी स्टॉक को रिफाइन कर बाजार में बेचा, जिससे रिफाइनिंग मार्जिन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई और मुनाफा रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।

मई में क्यों बढ़ाने पड़े ईंधन के दाम?

विश्लेषकों का कहना है कि अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। पहले से मौजूद सस्ता स्टॉक लगभग समाप्त हो चुका है और कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से ऊंची कीमतों पर कच्चा तेल खरीदना पड़ रहा है।

इसके साथ ही चुनावी माहौल और वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए लंबे समय तक पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई थी। बाजार विशेषज्ञों का दावा है कि इस अवधि में कीमतों को स्थिर रखने के कारण तेल कंपनियों को प्रतिदिन लगभग ₹1,000 करोड़ तक की अंडर-रिकवरी या नुकसान का सामना करना पड़ रहा था।

मई के मध्य से शुरू हुई मूल्य वृद्धि को कंपनियां इसी बढ़ती लागत और नुकसान की भरपाई के प्रयास के रूप में देख रही हैं।

आगे और बढ़ सकती हैं चुनौतियां

ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि भले ही बीता वित्त वर्ष तेल कंपनियों के लिए बेहद लाभकारी रहा हो, लेकिन यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं तो चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के नतीजे दबाव में आ सकते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार संभावित वित्तीय दबाव से बचने और नकदी स्थिति मजबूत बनाए रखने के लिए कंपनियों ने चरणबद्ध तरीके से पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने का रास्ता चुना है।

वित्त वर्ष 2025-26 में किस कंपनी ने कितना कमाया?

इंडियन ऑयल ने वित्त वर्ष 2025-26 में ₹36,802 करोड़ का शुद्ध मुनाफा दर्ज किया।

भारत पेट्रोलियम का शुद्ध मुनाफा ₹23,303 करोड़ रहा।

हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने ₹17,175 करोड़ का शुद्ध लाभ अर्जित किया।

तीनों कंपनियों का कुल सम्मिलित शुद्ध मुनाफा ₹77,280 करोड़ रहा।

दाम बढ़ाना सही या गलत? बहस जारी

विपक्षी दलों और उपभोक्ता संगठनों का तर्क है कि जब तेल कंपनियों के पास पिछले वर्ष का इतना बड़ा मुनाफा मौजूद है, तब उन्हें अस्थायी संकट का बोझ सीधे जनता पर नहीं डालना चाहिए। उनका मानना है कि कंपनियां अपने अर्जित लाभ का उपयोग कर कुछ समय तक उपभोक्ताओं को राहत दे सकती थीं।

वहीं पेट्रोलियम मंत्रालय और तेल कंपनियों का पक्ष अलग है। उनका कहना है कि सरकारी तेल कंपनियां शेयर बाजार में सूचीबद्ध हैं और उन्हें भविष्य की रिफाइनरी परियोजनाओं, हरित ऊर्जा निवेश, बुनियादी ढांचे के विस्तार तथा कच्चे तेल की आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने के लिए पर्याप्त पूंजी की आवश्यकता होती है।

कुल मिलाकर मौजूदा तस्वीर यह संकेत देती है कि कंपनियों का रिकॉर्ड मुनाफा बीते समय की परिस्थितियों का नतीजा है, जबकि पेट्रोल-डीजल की मौजूदा महंगाई अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती कीमतों और वैश्विक तनावों से जुड़ी हुई है। हालांकि इन तमाम आर्थिक और वैश्विक समीकरणों के बीच सबसे ज्यादा असर आम उपभोक्ता की जेब पर ही पड़ रहा है।

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