‘नो मैरिज, नो किड्स’ ट्रेंड से परेशान चीन! शादी और बच्चों से दूर हो रहे युवा, शी चिनफिंग सरकार के सामने गहराता जनसंख्या संकट

नई दिल्ली : दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन इस समय एक ऐसे संकट का सामना कर रहा है, जो आने वाले वर्षों में उसकी आर्थिक ताकत, सामाजिक संरचना और विकास की रफ्तार पर गहरा असर डाल सकता है। देश में तेजी से घटती शादियां और गिरती जन्मदर अब राष्ट्रपति शी चिनफिंग सरकार के लिए बड़ी चिंता का विषय बन गई हैं।

चीन में पिछले करीब एक दशक से ‘नो मैरिज, नो किड्स’ यानी शादी न करने और बच्चे पैदा न करने का चलन लगातार बढ़ रहा है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि वर्ष 2025 की पहली तिमाही में देश में विवाह पंजीकरण का आंकड़ा पिछले दस वर्षों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। इस अवधि में 17 लाख से भी कम शादियां दर्ज की गईं, जबकि 2017 के मुकाबले विवाह पंजीकरण लगभग आधा रह गया है।

शादी और बच्चे पैदा करने के लिए अभियान चला रही सरकार

घटती जन्मदर और कम होती शादियों को लेकर चीन सरकार लगातार सक्रिय नजर आ रही है। सरकार विभिन्न स्तरों पर लोगों को विवाह और परिवार बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है।

पिछले वर्ष चीन की एक कंपनी शांटियन केमिकल ग्रुप का नोटिस चर्चा में आया था, जिसमें 28 से 58 वर्ष की आयु के कर्मचारियों से सितंबर 2025 तक शादी करने को कहा गया था। नोटिस में यह भी उल्लेख किया गया था कि विवाह और परिवार से दूरी सरकार की जनसंख्या नीति के विपरीत मानी जा सकती है।

इसके अलावा सरकार विवाह परामर्श, मैचमेकिंग कार्यक्रमों और पारिवारिक जीवन को बढ़ावा देने के लिए विश्वविद्यालयों तक में विशेष पाठ्यक्रम शुरू कर चुकी है। सोशल मीडिया पर भी विवाह विरोधी या परिवार विरोधी कंटेंट की निगरानी बढ़ाई गई है।

सब्सिडी और आर्थिक मदद के बावजूद नहीं बदल रहे हालात

लोगों को शादी और बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से चीन सरकार ने कई प्रोत्साहन योजनाएं लागू की हैं। अब नागरिक देश के किसी भी हिस्से में अपनी शादी पंजीकृत करा सकते हैं। तीन साल तक के बच्चों के लिए हर वर्ष 3600 युआन यानी करीब 50 हजार रुपये से अधिक की सब्सिडी भी दी जा रही है।

इसके साथ ही मातृत्व और पितृत्व अवकाश की अवधि बढ़ाई गई है। कई क्षेत्रों में नवविवाहित जोड़ों को आर्थिक सहायता दी जा रही है, जबकि बच्चों के जन्म और चिकित्सा खर्चों में भी सरकारी सहयोग बढ़ाया गया है। इसके बावजूद युवाओं का बड़ा वर्ग शादी और मातृत्व-पितृत्व की जिम्मेदारी उठाने के प्रति उत्साहित नहीं दिख रहा।

महिलाओं पर बढ़ता दबाव बन रहा बड़ी वजह

विशेषज्ञों का मानना है कि घटती शादियों और जन्मदर के पीछे सबसे बड़ा कारण महिलाओं पर पड़ने वाला सामाजिक और पारिवारिक दबाव है। चीन में आज भी विवाह के बाद घर और बच्चों की जिम्मेदारी का बड़ा हिस्सा महिलाओं पर ही आ जाता है।

कामकाजी महिलाओं के सामने अक्सर करियर और परिवार के बीच संतुलन बनाने की चुनौती खड़ी हो जाती है। ऐसे में शिक्षित और आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिलाएं विवाह और मातृत्व को लेकर पहले की तुलना में अधिक सोच-समझकर निर्णय ले रही हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं के करियर, पदोन्नति और पेशेवर अवसरों पर भी असर पड़ता है, जिससे कई महिलाएं विवाह और मातृत्व को टालना या उससे दूरी बनाना पसंद कर रही हैं।

वन चाइल्ड पॉलिसी का असर अब आ रहा सामने

विशेषज्ञ चीन की मौजूदा स्थिति के पीछे 1980 में लागू की गई वन चाइल्ड पॉलिसी को भी एक प्रमुख कारण मानते हैं। उस समय बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के लिए दंपतियों को केवल एक बच्चा पैदा करने की अनुमति दी गई थी।

इस नीति ने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित तो किया, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम अब सामने आ रहे हैं। देश में बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है, जबकि कार्यशील आयु वर्ग की संख्या घट रही है। साथ ही लिंगानुपात में असंतुलन भी एक बड़ी समस्या बन चुका है।

महंगी जिंदगी भी रोक रही युवाओं को

विशेषज्ञों का कहना है कि आर्थिक कारण भी युवाओं को परिवार बढ़ाने से रोक रहे हैं। चीन में एक बच्चे को 18 वर्ष की आयु तक पालने-पोसने में औसतन 5.38 लाख युआन यानी करीब 76 लाख रुपये खर्च होते हैं।

महंगे मकान, बढ़ती शिक्षा लागत, स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च और रोजगार संबंधी अनिश्चितताएं भी युवाओं को विवाह और बच्चों की जिम्मेदारी लेने से पीछे हटने पर मजबूर कर रही हैं।

सिर्फ चीन नहीं, दुनिया के सामने भी चुनौती

घटती जन्मदर की समस्या केवल चीन तक सीमित नहीं है। दुनिया के अधिकांश देशों में प्रजनन दर रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से नीचे पहुंच चुकी है। भारत भी इस चुनौती से अछूता नहीं है और हालिया आंकड़ों के अनुसार देश की कुल प्रजनन दर 1.9 तक पहुंच गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आर्थिक सहायता या सब्सिडी देकर इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। इसके लिए सस्ती आवास व्यवस्था, बेहतर चाइल्ड केयर सुविधाएं, लैंगिक समानता, रोजगार सुरक्षा और परिवार की जिम्मेदारियों के समान बंटवारे जैसी नीतियों की जरूरत होगी।

सामाजिक सोच में बदलाव के बिना मुश्किल समाधान

जानकारों का मानना है कि जब तक महिलाओं पर परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी का असमान बोझ बना रहेगा, तब तक विवाह और मातृत्व के प्रति उनकी झिझक कम नहीं होगी। बदलती सामाजिक सोच, बेहतर अवसर और संतुलित पारिवारिक व्यवस्था ही इस संकट से निपटने का दीर्घकालिक समाधान हो सकती है।

 

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