48 डिग्री में उबल रहा बांदा! पेड़ों की कटाई, खनन और पहाड़ों के दोहन ने बिगाड़ा जिले का पर्यावरण संतुलन

बांदा: उत्तर प्रदेश का बांदा जिला भीषण गर्मी की मार से झुलस रहा है। बुधवार को यहां का तापमान 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो देश में सबसे अधिक दर्ज तापमानों में शामिल रहा। लगातार बढ़ती गर्मी को लेकर अब पर्यावरणविद, वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता भी चिंता जता रहे हैं। उनका मानना है कि जिले में तेजी से बिगड़ता इको सिस्टम इस भयावह स्थिति की बड़ी वजह बनता जा रहा है।

खनिज संपदा से भरपूर बांदा में नदियों और पहाड़ों का बड़े पैमाने पर दोहन हो रहा है। केन नदी समेत कई जलधाराओं में लगातार खनन गतिविधियां चल रही हैं। भारी मशीनों के जरिए नदी के प्राकृतिक स्वरूप को नुकसान पहुंच रहा है, जबकि पहाड़ों की खुदाई ने भी पर्यावरणीय संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।

खनन और पेड़ों की कटाई बनी बड़ी वजह

स्थानीय लोगों और पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि जिले में अंधाधुंध पेड़ों की कटाई और खनन ने गर्मी की तीव्रता को कई गुना बढ़ा दिया है। केन-बेतवा परियोजना और सड़क चौड़ीकरण जैसे विकास कार्यों के चलते बड़ी संख्या में पेड़ काटे गए, लेकिन उसके अनुपात में पौधरोपण नहीं हो सका।

पपरेंदा-सुमेरपुर मार्ग के फोरलेन निर्माण के दौरान भी हजारों पेड़ हटाए गए। पर्यावरणविदों का कहना है कि हरित आवरण घटने से इलाके में नमी कम हो रही है और तापमान तेजी से बढ़ रहा है।

हालांकि जिला खनिज अधिकारी राज रंजन का कहना है कि जिले में खनन निर्धारित मानकों के अनुसार किया जाता है। उन्होंने कहा कि कहीं भी अवैध खनन मिलने पर प्रशासन कार्रवाई करता है। उनका यह भी कहना है कि बांदा में पहले भी इस तरह का तापमान दर्ज हो चुका है।

विशेषज्ञ बोले- इको सिस्टम बिगड़ने का असर

दिल्ली स्थित जेएनयू के हिमनद एवं प्राकृतिक आपदा विशेषज्ञ डॉ. रुपेंद्र सिंह ने कहा कि बांदा में बढ़ती गर्मी का सबसे बड़ा कारण पर्यावरणीय असंतुलन है। उन्होंने बताया कि नदियों में अत्यधिक बालू खनन से प्राकृतिक संरचना प्रभावित हो रही है और भूजल स्तर पर भी असर पड़ रहा है।

उनके मुताबिक, पेड़ों की लगातार कटाई से हरित क्षेत्र कम हो रहे हैं, जिससे वातावरण में नमी घट रही है और गर्म हवाओं का असर बढ़ता जा रहा है। यही वजह है कि जिले में हीटवेव की स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है।

वन क्षेत्र बेहद कम, पौधरोपण पर सवाल

बांदा के प्रभागीय वनाधिकारी अरविंद ने बताया कि जिले में फिलहाल करीब 101.3 किलोमीटर क्षेत्र में ओपन फॉरेस्ट मौजूद है। उन्होंने माना कि तापमान बढ़ने के कई कारण हैं और विभाग इस वर्ष बड़े स्तर पर पौधरोपण अभियान की तैयारी कर रहा है।

वहीं पद्मश्री उमाशंकर पांडेय ने कहा कि बुंदेलखंड का पर्यावरणीय संतुलन तेजी से बिगड़ रहा है। उन्होंने कहा कि नदियां, जंगल और जल स्रोत एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और इनका संरक्षण बेहद जरूरी है। उन्होंने नीति निर्माताओं से इस दिशा में गंभीरता से सोचने की अपील की।

एक्सप्रेस-वे निर्माण में कटे लाखों पेड़

बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे निर्माण के दौरान करीब 1.90 लाख पेड़-पौधे काटे गए थे। इनमें कई पुराने और विरासत श्रेणी के पेड़ भी शामिल थे। बांदा के कनवारा गांव के पास लगभग 200 साल पुराना पीपल का पेड़ भी विकास कार्यों की भेंट चढ़ गया था।

आलोचकों का कहना है कि वन विभाग का पौधरोपण अभियान अक्सर कागजों तक सीमित रह जाता है। इस वर्ष भी जिले में 64 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य तय किया गया है, लेकिन अब तक के अनुभवों को देखते हुए इसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं। बांदा में वन क्षेत्र महज 3 प्रतिशत है, जबकि पर्यावरणीय संतुलन के लिए यह कम से कम 33 प्रतिशत होना चाहिए।

हीटवेव को लेकर प्रशासन अलर्ट

जिलाधिकारी अमित आसेरी ने लोगों से अपील की है कि अत्यधिक जरूरी काम होने पर ही घर से बाहर निकलें। उन्होंने लोगों को सूती और हल्के कपड़े पहनने, लगातार पानी पीने और धूप से बचाव करने की सलाह दी है।

प्रशासन ने हीटवेव को लेकर स्वास्थ्य विभाग और अन्य एजेंसियों को अलर्ट मोड पर रखा है। किसी भी व्यक्ति में लू या हीट स्ट्रोक के लक्षण दिखाई देने पर तत्काल अस्पताल पहुंचाने के निर्देश दिए गए हैं।

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