लखनऊ: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले विधान परिषद की 11 सीटों के नतीजों ने भाजपा की चुनौतियां बढ़ा दी हैं। पार्टी भले ही पिछली बार की तरह छह सीटें जीतने में सफल रही, लेकिन समाजवादी पार्टी की सीटों में बढ़ोतरी ने भाजपा के लिए नए सवाल खड़े कर दिए हैं। चुनाव परिणामों में लखनऊ की स्नातक सीट गंवाने के साथ ही कई सीटों पर हार ने पार्टी की रणनीति पर सवाल उठाए हैं। गोरखपुर से आगरा, प्रयागराज और लखनऊ तक भितरघात की चर्चा ने भी भाजपा की चिंता बढ़ाई है। प्रत्याशियों के टिकट देर से घोषित करना और जमीनी स्तर पर मतदाताओं को जोड़ने में कमी भी हार की प्रमुख वजहों में गिनी जा रही है।
विधान परिषद की जिन 11 सीटों पर चुनाव हुए, उनमें पिछली बार भाजपा के पास छह सीटें थीं। इस बार भी पार्टी छह सीटें जीतने में सफल रही, लेकिन नतीजों में हुए उलटफेर ने रणनीतिकारों को नए सिरे से तैयारी करने की चुनौती दी है। इन चुनावों को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सेमीफाइनल के तौर पर देखा जा रहा था। ऐसे में सत्ताधारी दल के लिए नतीजे राजनीतिक रूप से अहम माने जा रहे हैं।
देर से टिकट घोषित करना पड़ा भारी
भाजपा ने लखनऊ शिक्षक सीट से उमेश द्विवेदी, लखनऊ स्नातक सीट से अवनीश पटेल, बरेली-मुरादाबाद शिक्षक सीट से डॉ. हरि सिंह ढिल्लों, मेरठ शिक्षक सीट से श्रीचंद शर्मा और आगरा-अलीगढ़ स्नातक सीट से मानवेंद्र प्रताप सिंह को 24 मई को ही प्रत्याशी घोषित कर दिया था। ये सभी मौजूदा विधान परिषद सदस्य थे और चुनाव के लिए पहले से तैयारी कर रहे थे। इन पांच उम्मीदवारों में से केवल अवनीश पटेल को हार का सामना करना पड़ा।
इसके उलट छह सीटों पर भाजपा ने 29 सितंबर को प्रत्याशियों के नाम घोषित किए, जबकि मतदान 23 अक्टूबर को होना था। इससे उम्मीदवारों को चुनावी तैयारी और मतदाताओं तक पहुंचने के लिए अपेक्षाकृत कम समय मिला। पार्टी को इन छह सीटों में से चार पर हार का सामना करना पड़ा। इससे टिकट घोषित करने में हुई देरी को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
जमीनी तैयारी की कमी से हारीं कई सीटें
मेरठ स्नातक सीट पर भाजपा के दिनेश गोयल और गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट पर ध्रुव कुमार त्रिपाठी पहले से विधान परिषद सदस्य थे। दोनों को चुनावी तैयारी का फायदा मिला और वे जीतने में सफल रहे।
वहीं, आगरा शिक्षक सीट पर हरी किशोर तिवारी, वाराणसी स्नातक सीट पर केदार नाथ सिंह, वाराणसी शिक्षक सीट पर प्रमोद कुमार मिश्रा और इलाहाबाद-झांसी स्नातक सीट पर अशोक कुमार राठौर को हार का सामना करना पड़ा। इन सीटों पर टिकट के लिए दावेदार सक्रिय रहे, लेकिन मतदाता बनाने और उन्हें अपने पक्ष में जोड़ने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा सका।
पार्टी संगठन ने इन सीटों पर प्रचार और चुनावी गतिविधियों में ताकत लगाई, लेकिन समय की कमी और जमीनी स्तर पर समर्थक मतदाताओं की संख्या पर्याप्त नहीं बढ़ा पाने के कारण अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इन नतीजों ने संकेत दिया है कि केवल संगठनात्मक सक्रियता से चुनाव जीतना आसान नहीं है, बल्कि समय रहते मतदाताओं के बीच मजबूत पकड़ बनाना भी जरूरी है।
आगरा से गोरखपुर तक भितरघात की चुनौती
चुनाव के दौरान भाजपा को कई क्षेत्रों में भीतरघात का सामना करने की शिकायतें भी मिलीं। यह स्थिति आगरा से लेकर प्रयागराज, लखनऊ और गोरखपुर तक देखने को मिली। प्रतापगढ़ में स्थानीय संगठन ने एक पूर्व मंत्री पर विरोधियों की मदद करने की शिकायत की। यहां भाजपा प्रत्याशी को बहुत कम मत मिलने की सूचना भी सामने आई।
आगरा में भाजपा से जुड़े कई वित्तविहीन स्कूल संचालकों के सपा प्रत्याशी आकाश अग्रवाल का समर्थन करने की बात कही गई। पार्टी के कुछ नेता चुनावी गतिविधियों के बजाय सोशल मीडिया पर बैठकों की तस्वीरें साझा करने तक सीमित रहे। इससे संगठन के भीतर समन्वय और चुनावी सक्रियता को लेकर सवाल खड़े हुए।
चुनाव से ठीक पहले भाजपा छोड़कर सपा में गए संजयन त्रिपाठी और बागी तेवर दिखाने वाले भाजपा के एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह ने भी पार्टी को झटका दिया। इन घटनाक्रमों का असर गोरखपुर में भाजपा के ध्रुव त्रिपाठी की जीत के अंतर पर पड़ने की बात कही गई।
2027 से पहले भाजपा को बदलनी होगी रणनीति
एमएलसी चुनाव के नतीजों ने भाजपा के सामने विधानसभा चुनाव से पहले संगठन और चुनावी रणनीति को मजबूत करने की चुनौती रख दी है। खास तौर पर शिक्षित और प्रबुद्ध मतदाताओं के बीच पार्टी को अपनी बात अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचानी होगी। इसके लिए स्थानीय स्तर पर संपर्क बढ़ाने, समय रहते उम्मीदवारों का चयन करने और मतदाता सूची तैयार करने पर ध्यान देना होगा।
इसके साथ ही संगठन के भीतर असंतोष और भितरघात की शिकायतों को दूर करना भी पार्टी के लिए अहम होगा। दागी छवि वाले चेहरों को बदलने और पन्ना प्रमुखों की व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने जैसे कदमों पर भी जोर देने की जरूरत बताई जा रही है। विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के लिए इन नतीजों का संदेश साफ है कि सीटों की संख्या बरकरार रहने के बावजूद स्थानीय असंतोष, कमजोर जमीनी तैयारी और भीतरघात को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।
