
मुकेश शर्मा
हर साल तापमान में हो रही बढ़ोत्तरी से भीषण गर्मी की मार झेल रहे लोग, आग की लपटों से झुलसते जंगल, समुद्र का बढ़ता जल स्तर, पिघलते ग्लेशियर साफ़ संकेत दे रहे हैं कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति अब भी न चेते तो बहुत देर हो जाएगी। इन संकेतों को गंभीरता से लेते हुए आज जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर मुहिम चलाने की जरूरत है। वायु, जल और ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के जरूरी कदम उठाये जाएँ। पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता की अलख जगाने के लिए ही हर साल पांच जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इसका मकसद लोगों को सचेत करना है कि भावी पीढ़ी को धरती पर स्वस्थ वातावरण, हरित विकास प्रदान करना है तो आज ही उसके लिए वह सभी जरूरी कदम उठाएं जिससे पर्यावरण हरा-भरा, स्वच्छ और सुरक्षित बने। इस साल विश्व पर्यावरण दिवस की थीम-“प्रकृति से प्रेरित, जलवायु के लिए –हमारे भविष्य के लिए” तय की गयी है।
पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने का एक प्रमुख कारण ग्रीन हाउस गैसों जैसे- कार्बन डाइआक्साइड का बड़ी मात्रा में उत्सर्जन है, जिसके कारण जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और मौसम चक्र में बदलाव जैसी विभीषिका का अंदेशा बना हुआ है। इसके चलते ही लगातार तापमान में वृद्धि हो रही है, समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है और ग्लेशियर पिघल रहे हैं। जलवायु वैज्ञानिकों का तो यहाँ तक मानना है कि ग्रीन हॉउस गैसों का उत्सर्जन इसी तरह जारी रहा तो 21वीं सदी में तापमान तीन डिग्री से अधिक बढ़ सकता है। पेट्रोल-डीजल मोटर गाड़ियों की बढ़ती तादाद और कारखानों से निकलने वाले कचरे भी वायु और पर्यावरण को दूषित कर रहे हैं। इस समस्या से निजात पाने के लिए इलेक्ट्रानिक वाहनों को बढ़ावा देना होगा और सार्वजनिक वाहनों से यात्रा को प्राथमिकता देनी होगी ताकि कार्बन डाइआक्साइड के बड़ी मात्रा में उत्सर्जन में कमी लाने के साथ ही धूल और धुएं के प्रदूषण में भी कमी आ सके। धरती की शोभा को बढ़ाने वाले हरे-भरे पेड़ों की जगह कंक्रीट के जंगल ले रहे हैं, बन रहीं ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएं और कारखाने एक ओर जहाँ हमें आधुनिकता का भान करा रहे हैं वहीँ यह सभी पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं। ऑक्सीजन की समस्या से लोग जूझ रहे हैं, बीमारियाँ पाँव पसार रही हैं। कई वन्य जीवों और पौधों की प्रजातियाँ विलुप्त होने की कगार पर हैं। इसके लिए जरूरी है कि वृक्षारोपण को प्राथमिकता देते हुए उसकी देखभाल पर पूरा जोर दिया जाए ताकि लोगों को जरूरत भर की ऑक्सीजन आसानी से मुफ्त मिल सके। यह अनिवार्य बना देने की जरूरत है कि निर्माण कार्यों के लिए जितने पेड़ों को काटा जाए, उसका दोगुना वृक्षारोपण किया जाए। अंधाधुंध हो रही खदान पर भी लगाम लगाते हुए धरती की उर्वरा शक्ति को बनाये रखना होगा तभी जरूरत के मुताबिक़ लोगों को खाद्य सामग्री और पीने का पानी नसीब हो सकेगा। इसी के चलते जल स्तर में भी निरंतर गिरावट देखी जा रही है। सिंगल यूज प्लास्टिक के बढ़ते चलन पर पूरी तरह रोक लगानी होगी क्योंकि यह एक बड़े पर्यावरण प्रदूषण को जन्म दे रही है। ज्ञात हो कि आज प्लास्टिक, ग्लोबल वार्मिंग और प्रदूषण का बहुत बड़ा कारण बन चुकी है क्योंकि यह जल्दी नष्ट नहीं होती। इसलिए इसको चलन से बाहर करने में ही सभी की भलाई है।
पर्यावरण संरक्षण में युवा वैज्ञानिक, स्कूल-कॉलेज के बच्चे बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। यह पीढ़ी सोशल मीडिया या अन्य डिजिटल प्लेटफार्म के माध्यम से लोगों को पर्यावरण संरक्षण के बारे में जागरूक करने के साथ ही उसके लिए उठाये जाने वाले जरूरी क़दमों के लिए प्रेरित भी कर सकती है। युवा वर्ग अपनी दिनचर्या में उन छोटी-छोटी आदतों को अपना सकता है, जो पर्यावरण प्रदूषण को कम करने में सहायक बन सकते हैं, जैसे- सिंगल यूज प्लास्टिक से पूरी तरह दूरी बना लेना, सार्वजनिक वाहनों या साइकिल का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करना, वृक्षारोपण और उसकी देखभाल को पसंदीदा शौक बना लेना आदि। वृक्षारोपण और सफाई अभियानों में अपना बहुमूल्य समय देकर वह समाज के लिए प्रेरणास्रोत बन सकते हैं। युवा वैज्ञानिक भी कूड़ा-कचरा निस्तारण की आधुनिक तकनीक अपनाने और सौर ऊर्जा को प्राथमिकता देने के लिए लोगों को प्रेरित कर सकते हैं और समय-समय पर अपने शोध से उसमें और सुधार भी ला सकते हैं।
बढ़ता पर्यावरण प्रदूषण देश की अर्थव्यवस्था पर भी प्रभाव डाल रहा है। इसकी वजह से बढ़ती बीमारियों से निपटने के लिए एक बड़ी राशि खर्च करनी पड़ रही है। सीमित प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ती आबादी का भी दबाव साफ़ देखा जा सकता है। शहरीकरण के चलते कृषि योग्य भूमि कम होती जा रही है। उर्वरा शक्ति की कमी के चलते अनाज की पैदावार में भी निरंतर कमी देखी जा रही है। यही स्थिति रही तो आने वाली पीढ़ी को भरपेट भोजन और पीने के लिए स्वच्छ जल तक मिलना मुश्किल हो जायेगा। इसी भयावह स्थिति का अंदाजा लगाते हुए ही संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 1972 में पांच जून को विश्व पर्यावरण दिवस की शुरुआत की थी क्योंकि तब तक पर्यावरण प्रदूषण वैश्विक समस्या का रूप अख्तियार कर चुका था। “केवल एक पृथ्वी” स्लोगन के साथ पहला विश्व पर्यावरण दिवस वर्ष 1973 में मनाया गया ताकि पर्यावरण प्रदूषण के हर संभावित जोखिम के बारे में वैश्विक स्तर पर लोगों को आगाह किया जा सके और उससे बचने के उपायों के बारे में हर जरूरी सन्देश भी लोगों तक पहुंचाए जा सकें।
(लेखक पापुलेशन सर्विसेज इंटरनेशनल इंडिया के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं)
