करवाचौथ : सुहाग की अमरता का पवित्र व्रत, जो स्त्री और पुरुष को सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन में एकसाथ बांधता है

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सावित्री ने अपने पति सत्यवान की मृत्यु के बाद यमराज से उनकी जान वापस मांग ली थी

लखनऊ। एक धार्मिक संस्कार हिंदू समाज में विवाह न केवल दो व्यक्तियों का मिलन है, बल्कि यह एक पवित्र धार्मिक संस्कार है, जो स्त्री और पुरुष को सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन में एकसाथ बांधता है। इस बंधन को दंपति जीवन के रूप में जाना जाता है, जो प्रेम, विश्वास और कर्तव्यों पर आधारित है। हिंदू संस्कृति में पति-पत्नी का यह रिश्ता जीवन भर के लिए अटूट माना जाता है, और इसे और भी मजबूत बनाने के लिए विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान और व्रत प्रचलित हैं ।

करवाचौथ का व्रत हिंदू समाज में विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य के लिए रखा जाता है । यह व्रत कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं निर्जला उपवास रखती हैं और चंद्रमा को अघ्य देकर अपने पति की लंबी उम्र की प्रार्थना करती हैं । यह व्रत न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि यह दंपति के बीच प्रेम और समर्पण का प्रतीक भी है। करवाचौथ का महत्व प्राचीन काल से चला आ रहा है।

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इतिहास और पौराणिक कथाओं में कई उदाहरण मिलते हैं, जो इस व्रत की महत्ता को दर्शाते हैं। जैसे कि सावित्री – सत्यवान की कथा, जिसमें सावित्री ने अपने पति सत्यवान की मृत्यु के बाद यमराज से उनकी जान वापस मांग ली थी। यह कथा महिलाओं के समर्पण और विश्वास को दर्शाती है। इसी तरह, करवाचौथ की कथाओं में वीरवती और अन्य पौराणिक कहानियां भी शामिल हैं, जो इस व्रत के महत्व को रेखांकित करती हैं।

धार्मिक अनुष्ठान और परंपराएं
करवाचौथ के दिन महिलाएं सुबह सूर्योदय से पहले सरगी खाती हैं, जो सास द्वारा दी गई थाली होती है । इसके बाद पूरे दिन निर्जला व्रत रखा जाता है। शाम को करवा माता की पूजा की जाती है, जिसमें करवे (मिट्टी के बर्तन) का विशेष महत्व है। महिलाएं एक-दूसरे को करवाचौथ की कथा सुनाती हैं और रात में चंद्रमा के दर्शन के बाद पति के हाथों जल ग्रहण कर व्रत खोलती हैं। यह परंपरा न केवल धार्मिक है, बल्कि सामाजिक एकता और परिवार के बीच प्रेम को भी बढ़ावा देती है ।

सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व
करवाचौथ का व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह हिंदू समाज में स्त्रियों की अहम भूमिका को भी दर्शाता है। यह व्रत महिलाओं के त्याग, समर्पण और उनके पति के प्रति अटूट प्रेम को प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त करता है । इसके साथ ही, यह सामाजिक मेलजोल का अवसर भी प्रदान करता है, जहां महिलाएं एक साथ इकट्ठा होकर पूजा करती हैं और अपनी खुशियां साझा करती हैं।

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