यूपी के विधायक राजा भैया को बड़ी राहत, पत्नी उत्पीड़न केस में चार्जशीट पर संज्ञान लेने से दिल्ली कोर्ट का इनकार

नई दिल्ली की एक अदालत ने उत्तर प्रदेश के कुंडा से विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया को बड़ी कानूनी राहत दी है। पत्नी के उत्पीड़न के आरोप में उनके खिलाफ दाखिल आरोप पत्र पर अदालत ने संज्ञान लेने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बहुत पुरानी और कथित घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने से शिकायतकर्ता को कोई कानूनी लाभ नहीं मिल सकता और आपराधिक कानून का इस्तेमाल इस तरह नहीं किया जा सकता।

समयसीमा के कारण आरोपों पर उठे सवाल

मामले की सुनवाई अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अश्वनी पंवार की अदालत में हुई, जहां दिल्ली पुलिस ने आईपीसी की धारा 498ए के तहत दाखिल अंतिम रिपोर्ट पर संज्ञान लेने की मांग की थी। अदालत ने कहा कि वह इस बात से संतुष्ट नहीं है कि प्रथम दृष्टया इस धारा के तहत अपराध के आवश्यक तत्व स्पष्ट रूप से सामने आते हैं। साथ ही अदालत ने यह भी माना कि शिकायत में लगाए गए आरोप समयसीमा की दृष्टि से भी वैध नहीं ठहरते।

पुरानी घटनाओं के आधार पर केस आगे बढ़ाने से इनकार

अदालत ने टिप्पणी की कि प्राथमिकी को ध्यान से पढ़ने पर यह सामने आता है कि शारीरिक हिंसा और स्पष्ट क्रूरता से जुड़े मुख्य आरोप वर्ष 2015 की एक कथित घटना तक सीमित हैं। अदालत ने कहा कि शादी के वर्ष 1995 से लेकर 2015 तक किसी भी प्रकार की शारीरिक क्रूरता का कोई स्पष्ट आरोप सामने नहीं आता है, जो इस मामले को कमजोर बनाता है।

एफआईआर दर्ज होने में लंबे अंतराल पर कोर्ट की टिप्पणी

अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि यह प्राथमिकी मार्च 2025 में दिल्ली के सफदरजंग एन्क्लेव थाने में दर्ज की गई थी, जबकि कथित घटनाओं के बाद काफी लंबा समय बीत चुका था। कोर्ट ने रिकॉर्ड के आधार पर कहा कि दोनों पक्ष वर्ष 2017 से 2025 तक लंबे समय से अलग रह रहे थे, जिससे आरोपों की समयबद्धता और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं।

अपराध के संज्ञान का कोई औचित्य नहीं

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने कहा कि कथित अपराध का संज्ञान लेने का कोई औचित्य नहीं बनता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हालिया समय में यदि कोई ऐसा कृत्य सामने नहीं आता जो क्रूरता को साबित करे, तो पुराने आरोपों के आधार पर आपराधिक कार्रवाई आगे नहीं बढ़ाई जा सकती।

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