वक्फ या ‘वक़्त का खेल’? लखनऊ में निजी ज़मीन पर कब्जे का आरोप

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने वक्फ संपत्तियों की पारदर्शिता पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। गौतम अग्रवाल और उनके परिवार ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि उनकी पुश्तैनी निजी जमीन को वक्फ की संपत्ति बताकर जबरन कब्जे में लिया जा रहा है

परिवार का दावा है कि खसरा संख्या 479 और 480, मोहल्ला इरादत नगर, थाना हसनगंज स्थित यह भूमि दशकों से उनके कब्जे में है और इसके सभी रजिस्टर्ड सेल डीड (1968) मौजूद हैं।

दस्तावेज़ हैं, लेकिन ‘वक्फ’ का ठप्पा कैसे लगा?

शिकायत में कहा गया है कि यह जमीन कभी भी वक्फ घोषित नहीं की गई, न कोई नोटिफिकेशन, न कोई अधिसूचना, न ही कोई वैध दस्तावेज। इसके बावजूद, पास स्थित एक मस्जिद और मदरसे के कथित मुतवल्लियों द्वारा इस भूमि के हिस्से पर गेट लगाकर रास्ता बंद कर दिया गया और अंदर आने-जाने पर रोक लगा दी गई।

रास्ता मस्जिद से, बोर्ड बदल-बदल कर!

परिवार ने आरोप लगाया है कि मदरसे का नाम बार-बार बदला गया। अस्थायी बोर्ड लगाए गए। जमीन पर जाने का रास्ता मस्जिद के भीतर से कर दिया गया।

जब जानकारी मांगी गई तो जवाब मिला—“यह वक्फ की जमीन है”, लेकिन किस आधार पर? इसका कोई जवाब नहीं।

CM योगी से मांग: फर्जी वक्फ दस्तावेज़ रद्द हों

पीड़ित परिवार ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि कोई फर्जी वक्फ दावा है तो उसे निरस्त किया जाए। और परिवार को उनकी पैतृक भूमि का शांतिपूर्ण कब्जा वापस दिलाया जाए। पत्र की प्रतिलिपि मंडलायुक्त, जिलाधिकारी और पुलिस आयुक्त को भी भेजी गई है।

बड़ा सवाल: वक्फ कानून या वक्फ का दुरुपयोग?

यह मामला सिर्फ एक परिवार की जमीन का नहीं, बल्कि उस सिस्टम का है जहाँ “जिसके पास दस्तावेज़ हैं, उसे भी साबित करना पड़ रहा है कि वह मालिक है।”

यदि समय रहते ऐसे मामलों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो निजी संपत्तियों पर वक्फ विवाद आने वाले समय में और बढ़ सकते हैं।

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