दो संस्कृतियां, एक रिश्ता: विजय देवरकोंडा और रश्मिका मंदाना की शादी में दिखा तेलुगु-कोडवा परंपराओं का अनोखा संगम

विजय देवरकोंडा और रश्मिका मंदाना का विवाह भारतीय सांस्कृतिक विविधता की ऐसी मिसाल बनकर सामने आया है, जहां एक ओर पारंपरिक तेलुगु रीति-रिवाजों की झलक दिखी तो दूसरी ओर कर्नाटक के कुर्ग (कोडागु) क्षेत्र के ‘कोडवा’ समुदाय की अनूठी परंपराओं ने इस रिश्ते को खास बना दिया। एक ही शादी में दो बिल्कुल अलग संस्कृतियों की रस्में इस तरह निभाई गईं कि यह मिलन दो अलग दुनियाओं के संगम जैसा प्रतीत हुआ।

तेलुगु परंपरा के वैदिक मंत्रों के बीच संपन्न हुआ विवाह

विजय देवरकोंडा की परंपरा के अनुसार सुबह आयोजित विवाह पूरी तरह वैदिक रीति-रिवाजों के तहत हुआ। तेलुगु शादियों में ‘जीलाकारा-बेल्लम’ रस्म को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस रस्म में दूल्हा-दुल्हन एक-दूसरे के सिर पर जीरा और गुड़ का पेस्ट रखते हैं। मान्यता है कि जैसे जीरा और गुड़ मिलकर नया स्वाद रचते हैं, वैसे ही दंपति जीवन के हर सुख-दुख में एकजुट रहेंगे।

इसके बाद ‘तलमब्रालु’ की रस्म निभाई गई, जिसमें दोनों एक-दूसरे पर हल्दी मिश्रित चावल और मोती बरसाते हैं। यह परंपरा हंसी-मजाक, समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक मानी जाती है। तेलुगु विवाह में अग्नि को साक्षी मानकर मंत्रोच्चार किए जाते हैं और पूरे समारोह में सात्विक, शाकाहारी भोजन की प्रधानता रहती है।

कोडवा रीति-रिवाजों में बिना पंडित और फेरे के शादी

शाम को आयोजित रश्मिका की ‘कोडवा’ परंपरा की शादी उत्तर भारतीय और तेलुगु शादियों से बिल्कुल अलग नजर आई। कोडवा समुदाय की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां विवाह संपन्न कराने के लिए न तो पंडित की आवश्यकता होती है और न ही अग्नि के फेरे लिए जाते हैं। यह पूरी तरह बुजुर्गों के आशीर्वाद और योद्धा परंपराओं पर आधारित संस्कार है।

रश्मिका की शादी में ‘बाले बिरुदु’ रस्म विशेष आकर्षण का केंद्र रही, जहां दूल्हा पारंपरिक तलवार ‘पीचे कत्ती’ से केले के तनों को एक ही वार में काटकर अपनी शक्ति और कौशल का प्रदर्शन करता है। इसके अलावा ‘गंगा पूजा’ जैसी रस्मों के माध्यम से दुल्हन का नए परिवार में स्वागत किया जाता है, जो जल और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना को दर्शाती है।

धार्मिक बनाम सामाजिक संरचना का फर्क

तेलुगु शादी पूरी तरह धार्मिक और वैदिक परंपरा पर आधारित होती है। इसमें अग्नि (होमम), सप्तपदी और ब्राह्मण पंडित की उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है। हर रस्म के साथ संस्कृत मंत्रोच्चार जुड़ा होता है। इसके विपरीत, कोडवा विवाह एक सामाजिक और पारिवारिक संस्कार है, जहां प्रकृति और पूर्वजों को साक्षी माना जाता है। परिवार के बुजुर्ग ही गुरु की भूमिका निभाते हैं और जोड़े का हाथ एक-दूसरे को सौंपते हैं। वैदिक मंत्रों की अनुपस्थिति इस परंपरा को भारत की अनूठी विवाह पद्धतियों में शामिल करती है।

शाकाहार और मांसाहार की अलग पहचान

दोनों संस्कृतियों के विवाह में खान-पान का अंतर भी खास चर्चा में रहा। तेलुगु शादियां पारंपरिक रूप से शाकाहारी होती हैं, जहां केले के पत्तों पर सात्विक भोजन परोसा जाता है। वहीं, कोडवा समुदाय में मांस और मदिरा का सेवन उत्सव का हिस्सा माना जाता है। कोडवा शादियों में ‘पंदी करी’ यानी सुअर के मांस का व्यंजन प्रमुख माना जाता है। ऐसे में इस विवाह में दोनों स्वादों का संतुलन अपने आप में विशेष रहा।

परिधान और शस्त्र परंपरा में भी बड़ा अंतर

तेलुगु विवाह में दूल्हा रेशमी धोती और कंधुवा (अंगवस्त्र) धारण करता है, जबकि दुल्हन कांजीवरम रेशम की साड़ी में सजी होती है। दूसरी ओर, कोडवा शादी में दुल्हन विशेष शैली में साड़ी पहनती है, जिसमें पल्लू पीछे की ओर से लाया जाता है और चुन्नटें पीछे रहती हैं। दूल्हा ‘कुप्पिया’ नामक लंबा काला कोट और ‘चेले’ कमरबंद पहनता है, जो योद्धा परंपरा की पहचान है।

जहां तेलुगु शादी में मंगलसूत्र और मट्टेलु (बिछिया) पहनाने का क्षण भावुकता से भरा होता है, वहीं कोडवा परंपरा में शस्त्र पूजा और तलवार धारण करना अहम माना जाता है। ‘पीचे कत्ती’ को कमर में बांधना वीरता और सैन्य गौरव का प्रतीक है। एक ओर भक्ति और शांति की झलक मिलती है, तो दूसरी ओर साहस और परंपरागत शौर्य का प्रदर्शन दिखाई देता है।

विजय देवरकोंडा और रश्मिका मंदाना ने इन दोनों भिन्न लेकिन समृद्ध परंपराओं को एक साथ अपनाकर यह संदेश दिया कि प्रेम किसी भी सांस्कृतिक सीमाओं से बड़ा होता है और विविधता ही भारतीय परंपरा की सबसे बड़ी ताकत है।

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