लखनऊ में चल रहे बजट सत्र के दौरान विधानसभा में युवाओं की बेरोजगारी, कौशल विकास और आईटीआई संस्थानों के निजीकरण का मुद्दा जोरदार ढंग से उठा। नेता विधानमंडल दल कांग्रेस आराधना मिश्रा मोना ने प्रदेश के राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआई) की स्थिति पर सरकार को कठघरे में खड़ा किया।
उन्होंने आरोप लगाया कि रोजगार सृजन और कौशल विकास के नाम पर स्थापित सरकारी प्रशिक्षण संस्थानों की अनदेखी की जा रही है और उन्हें निजी क्षेत्र को सौंपा जा रहा है, जिससे युवाओं पर महंगी फीस का बोझ बढ़ेगा।
ग्रामीण युवाओं पर पड़ेगा महंगी फीस का असर
आराधना मिश्रा मोना ने कहा कि कांग्रेस सरकारों के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में खोले गए राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों से युवाओं को प्रशिक्षण के बाद बेहतर वेतन वाली नौकरी या स्वरोजगार का अवसर मिलता था। उनका आरोप है कि मौजूदा भाजपा सरकार इन संस्थानों को समाप्त करने की दिशा में काम कर रही है।
उन्होंने कहा कि पहले सरकारी आईटीआई में 700 से 1000 रुपये तक फीस ली जाती थी और छात्रों को स्टाइपेंड भी दिया जाता था, जिससे वे प्रशिक्षण के लिए प्रोत्साहित होते थे। अब पीपीपी मॉडल के तहत निजी कंपनियों को संचालन सौंपे जाने के बाद 70 प्रतिशत सीटें प्राइवेट कोटे से भरी जाएंगी, जिससे मनमानी फीस वसूली की आशंका है और इसका सीधा असर किसान परिवारों पर पड़ेगा।
निजी संस्थानों की फीस सरकार तय करे
कांग्रेस नेता ने मांग की कि निजी क्षेत्र द्वारा संचालित आईटीआई संस्थानों की फीस का निर्धारण सरकार द्वारा किया जाए, ताकि गरीब और मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चों के हितों की रक्षा हो सके। उन्होंने कहा कि निजी कंपनियों की मनमानी प्रदेश के युवाओं पर भारी पड़ सकती है।
37 आईटीआई स्वीकृत, 32 के भवन बने लेकिन प्रशिक्षण शुरू नहीं
आराधना मिश्रा मोना ने विधानसभा में सरकार के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि पिछले 8 वर्षों में 37 राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान स्वीकृत किए गए, जिनमें से 32 के भवन बनकर तैयार हो चुके हैं, लेकिन वहां प्रशिक्षण शुरू नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि एक आईटीआई भवन के निर्माण पर 10 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होता है, लेकिन यदि वहां प्रशिक्षण ही न हो तो उसका क्या औचित्य है।
कई जिलों के संस्थानों का संचालन निजी कंपनी को, कक्षाएं अब तक शुरू नहीं
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि हिंदुस्तान लेटेस्ट नामक कंपनी को प्रतापगढ़, इटावा, बाराबंकी, कन्नौज और देवबंद के संस्थानों का संचालन सौंपा गया है, लेकिन वहां अब तक प्रशिक्षण कक्षाएं शुरू नहीं हो सकी हैं। प्रतापगढ़ के लालगंज में 2017 से भवन तैयार है, बावजूद इसके नौ वर्षों बाद भी प्रशिक्षण शुरू नहीं हो पाया। छात्रों को ऐसे कॉलेज आवंटित कर दिए गए जहां कक्षाएं नहीं चल रहीं, जिससे उन्हें जिला मुख्यालय जाना पड़ रहा है और समय व धन दोनों की बर्बादी हो रही है। उन्होंने ऐसी एजेंसियों की जवाबदेही तय करने की मांग की।
स्टाफ की भारी कमी, बिना भर्ती कैसे चलेंगे संस्थान?
आराधना मिश्रा मोना ने आईटीआई में स्टाफ की कमी का मुद्दा भी उठाया। उनके अनुसार एक आईटीआई में 30 से अधिक अनुदेशक, एक प्रधानाचार्य, तीन कार्यदेशक, सात प्रशासकीय अधिकारी और नौ चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी आवश्यक होते हैं, लेकिन इन पदों पर अब तक भर्ती नहीं हुई है। उन्होंने सवाल किया कि बिना शिक्षकों और स्टाफ के ये संस्थान कैसे संचालित होंगे।
अंत में उन्होंने सभी आईटीआई संस्थानों को शीघ्र शुरू करने, आवश्यक स्टाफ की भर्ती करने, संचालन कर रही एजेंसियों की जवाबदेही तय करने और फीस पर सख्त सरकारी नियंत्रण की मांग की। उन्होंने कहा कि युवाओं का भविष्य अधर में लटकाकर कोई भी राज्य प्रगति नहीं कर सकता।
