उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU) में फेफड़ों की गंभीर बीमारियों के इलाज को लेकर बड़ी पहल शुरू की जा रही है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने उन्नत फेफड़ा प्रत्यारोपण यूनिट स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। इस नई सुविधा के शुरू होने से प्रदेश के गंभीर फेफड़ा रोगियों को राज्य के बाहर जाने की जरूरत कम हो जाएगी और उन्हें विश्वस्तरीय इलाज स्थानीय स्तर पर मिल सकेगा।
कुलपति ने दी बड़ी जानकारी
KGMU की कुलपति प्रो. सोनिया नित्यानंद ने बताया कि विश्वविद्यालय का पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग आधुनिक फेफड़ा प्रत्यारोपण यूनिट की स्थापना की दिशा में तेजी से काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि इससे गंभीर फेफड़ा रोगों से पीड़ित मरीजों को उन्नत चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकेंगी।
उन्होंने यह जानकारी पल्मोनरी एंड क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग, इंडियन चेस्ट सोसाइटी और पल्मोक्रिट फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में शताब्दी अस्पताल फेज-दो में आयोजित एडवांस्ड इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजी सम्मेलन के दौरान दी।
सबस्पेशियलिटी सेवाओं से मिलेगा बेहतर उपचार
सम्मेलन में KGMU के विशेषज्ञ प्रो. रवि कांत ने कहा कि चिकित्सा क्षेत्र में सबस्पेशियलिटी सेवाओं के विकास से मरीजों को अधिक सटीक और रोगी-केंद्रित उपचार उपलब्ध कराया जा सकेगा।
वहीं, प्रख्यात विशेषज्ञ प्रो. डी. बेहेरा ने कहा कि भारत में इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजी ने पिछले दो दशकों में उल्लेखनीय प्रगति की है और KGMU का पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग इस क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
देशभर के विशेषज्ञों ने साझा किया अनुभव
सम्मेलन में कई वरिष्ठ चिकित्सा विशेषज्ञों ने भाग लिया और आधुनिक इलाज तकनीकों पर चर्चा की। इस दौरान प्रो. वेद प्रकाश, प्रो. आलोक नाथ, हैदराबाद के प्रख्यात इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजिस्ट प्रो. सुभाकर कांडी, डा. आशुतोष सचदेवा और प्रो. राजेंद्र प्रसाद ने अपने विचार रखे।
कैंसर को लेकर विशेषज्ञों की चेतावनी
सम्मेलन में विशेषज्ञों ने कैंसर जैसी गंभीर बीमारी को लेकर भी लोगों को जागरूक किया। उन्होंने बताया कि कैंसर शरीर की सामान्य कोशिकाओं में होने वाले बदलाव के कारण अनियंत्रित और असामान्य वृद्धि से शुरू होता है, जिससे ट्यूमर यानी गांठ बनती है। यदि समय पर इलाज न कराया जाए तो यह बीमारी आसपास के स्वस्थ ऊतकों और रक्त व लसीका तंत्र के माध्यम से शरीर के अन्य हिस्सों तक फैल सकती है।
