वाराणसी। परंपरा, आस्था और विवाद—इन तीनों के बीच काशी के महाश्मशान में एक बार फिर मसान की होली खेली गई। रोक और विरोध की चर्चाओं के बावजूद मणिकर्णिका घाट स्थित बाबा मसाननाथ मंदिर में सुबह से ही पूजा-अर्चना का क्रम शुरू हो गया। नागा साधु और अन्य संतों ने बाबा को चिता भस्म अर्पित कर इस अनूठे उत्सव की औपचारिक शुरुआत की। जैसे-जैसे दिन चढ़ा, मणिकर्णिका घाट पर श्रद्धालुओं और दर्शकों की भीड़ उमड़ पड़ी।
मान्यता है कि रंगभरी एकादशी के अगले दिन भगवान शिव अपने गणों के साथ यहां भस्म फाग खेलने आते हैं। काशी में जीवन और मृत्यु को समान भाव से स्वीकार करने की परंपरा रही है, जहां देवस्थान और महाश्मशान का महात्म्य एक जैसा माना जाता है। फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को महादेव के मणिकर्णिका आगमन की आस्था इस आयोजन की आध्यात्मिक आधारशिला है। इस अवसर पर काशी ही नहीं, बल्कि देश-विदेश से आए पर्यटक भी शामिल हुए। हालांकि इस बार निर्माण कार्यों और विरोध के कारण भीड़ अपेक्षाकृत कम रही, फिर भी चिता भस्म की होली विधिवत संपन्न हुई।
शास्त्रीयता को लेकर उठा विवाद
इस बार आयोजन की शास्त्रीयता को लेकर बहस तेज रही। डोमराजा Vishwanath Chaudhary ने प्रशासन को ज्ञापन देकर विरोध जताया। वहीं उनके परिवार के कुछ सदस्य आयोजन के समर्थन में नजर आए। आयोजकों का कहना है कि रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन महाश्मशान में भस्म होली खेलना इस दर्शन की सहज व्याख्या है कि मृत्यु को जानकर भी जीवन की तरह स्वीकार करना ही शिवत्व है।
पौराणिक मान्यता से जुड़ी है परंपरा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, विवाह के समय अपने गणों के कारण ससुराल पक्ष में उत्पन्न भय को देखते हुए भगवान शिव उन्हें गौने की बरात में साथ नहीं ले गए थे। इसी टीस को मिटाने के लिए उन्होंने मणिकर्णिका पर अपने गणों को बुलाकर उनके साथ चिता भस्म की होली खेली। यही परंपरा कालांतर में आस्था के रूप में स्थापित हो गई।
मसाननाथ महादेव मंदिर के व्यवस्थापक Gulshan Kapoor ने वर्ष 2009 में इस आयोजन को पुनः आरंभ किया था। तब से इसकी पहचान देश ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुकी है।
विवादों और मतभेदों के बीच भी इस वर्ष मणिकर्णिका घाट पर मसान की होली ने आस्था का रंग बिखेरा। महाश्मशान में गूंजते हर-हर महादेव के जयकारों के साथ चिता भस्म की होली ने एक बार फिर काशी की अद्वितीय सांस्कृतिक परंपरा को जीवंत कर दिया।
