बिहार विधानसभा चुनाव 2025 : भाजपा की राह पर राजग सहयोगी, 183 उम्मीदवारों में एक भी मुस्लिम नहीं

बिहार विधानसभा चुनाव 2025

पटना। बिहार विधानसभा चुनाव के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने अब तक अपने 183 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है। चौंकाने वाली बात यह है कि इन सभी उम्मीदवारों में एक भी मुस्लिम चेहरा शामिल नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजग के सहयोगी दल अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की “हिंदू वोट बैंक” वाली रणनीति को ही अपनाने लगे हैं।

भाजपा-जदयू समेत सभी सहयोगी दलों ने अल्पसंख्यकों को किया दरकिनार

राजग के घटक दलों में भाजपा ने अपने 101 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है।

पहली सूची: 71 उम्मीदवार

दूसरी सूची: 12 उम्मीदवार

तीसरी (अंतिम): 18 उम्मीदवार

इसी तरह जदयू ने 57, लोजपा-आर ने 15, हम ने 6 और उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएम ने 4 उम्मीदवार घोषित किए हैं।
इन सभी सूचियों में किसी भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया गया है।

भाजपा का फोकस सवर्ण और अति पिछड़ा वर्ग

भाजपा की सूची में इस बार राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मण और वैश्य वर्ग को प्राथमिकता दी गई है। यादव समुदाय के कई नेताओं के टिकट काट दिए गए हैं, जिनमें बिहार विधानसभा अध्यक्ष नंद किशोर यादव का नाम प्रमुख है।
इसके बदले दानापुर से राम कृपाल यादव को उम्मीदवार बनाकर कुछ हद तक संतुलन साधने की कोशिश की गई है।

भाजपा का यह जातीय समीकरण संकेत देता है कि पार्टी सवर्ण और अति पिछड़े वर्गों के गठजोड़ पर भरोसा कर रही है।
राज्य में अति पिछड़ा वर्ग लगभग 36 प्रतिशत मतों का हिस्सा रखता है, जिन्हें राजनीतिक विश्लेषक “चुप्पा वोटर” कहते हैं।

नीतीश कुमार की रणनीति: यूपी मॉडल का दोहराव

जदयू की सूची भले ही जातीय रूप से कुछ संतुलित दिखाई दे, लेकिन उसमें भी मुस्लिम प्रतिनिधित्व शून्य है।
यह रणनीति नीतीश कुमार की पुरानी नीति से मेल खाती है, जिसमें वे अति पिछड़े वर्गों पर निर्भर रहे हैं।
इसी मॉडल को भाजपा ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 और 2022 में अपनाया था, जिसके परिणामस्वरूप भाजपा को भारी बहुमत मिला था।

यह स्पष्ट है कि राजग अब बिहार में भी वही “EBC + सवर्ण गठबंधन” फॉर्मूला दोहराने की कोशिश में है।

सामाजिक समीकरणों का बदलता गणित

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह निर्णय बिहार के सामाजिक समीकरणों में बड़ा बदलाव ला सकता है।
मुस्लिम उम्मीदवारों की अनुपस्थिति से जहां राजग का अल्पसंख्यक वर्ग से दूरी बढ़ने की संभावना है, वहीं हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण भी तेज हो सकता है।

साल 2005 से अति पिछड़ा वर्ग नीतीश कुमार का पारंपरिक समर्थक रहा है। हालांकि, इस वर्ग में कोई राज्यस्तरीय नेता अब तक उभर नहीं पाया है।
नब्बे के दशक में लालू प्रसाद यादव ने इस वर्ग से किसी बड़े नेता को नहीं उभरने दिया, और अब नीतीश कुमार भी उसी राह पर चलते दिखाई दे रहे हैं।

राजनीतिक संदेश स्पष्ट

राजग की घोषित सूचियाँ यह संकेत देती हैं कि इस बार चुनाव में धार्मिक संतुलन की बजाय जातीय गठजोड़ को तरजीह दी जा रही है।
भाजपा और उसके सहयोगी दलों का लक्ष्य सवर्णों, अति पिछड़ों और कुछ ओबीसी वर्गों को एकजुट कर एक बड़ा हिंदू वोट बैंक तैयार करना है — जो विपक्षी गठबंधन के लिए चुनौती बन सकता है।

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