नई दिल्ली: 16 जुलाई से भगवान जगन्नाथ की विश्वप्रसिद्ध रथ यात्रा 2026 का शुभारंभ होने जा रहा है। सनातन परंपरा के सबसे भव्य धार्मिक आयोजनों में शामिल इस पर्व में भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ भव्य रथों पर विराजमान होकर नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं। रथ यात्रा से जुड़ी एक विशेष परंपरा हर वर्ष श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करती है, जिसमें भगवान के रथ के मार्ग की सफाई सोने के हत्थे वाली झाड़ू से की जाती है। इस अनुष्ठान को ‘छेरा पहंरा’ कहा जाता है और इसका गहरा धार्मिक महत्व माना जाता है।
क्या है ‘छेरा पहंरा’ की परंपरा?
पुरी में आयोजित रथ यात्रा के दौरान गजपति महाराज या उनके राजवंश के उत्तराधिकारी स्वयं हाथ में सोने के हत्थे वाली झाड़ू लेकर भगवान के रथ और उसके मार्ग की सफाई करते हैं। इसके बाद सुगंधित जल और पुष्पों का छिड़काव किया जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसे भगवान के प्रति सर्वोच्च सेवा का प्रतीक माना जाता है।
पहला कारण: भगवान के सामने राजा भी केवल सेवक
इस परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि भगवान के सामने कोई भी व्यक्ति बड़ा या छोटा नहीं होता। गजपति महाराज पहले भगवान जगन्नाथ को प्रणाम करते हैं और फिर स्वयं झाड़ू लगाकर सेवा करते हैं। यह दर्शाता है कि सत्ता, पद और राजसी वैभव से ऊपर भगवान की भक्ति और सेवा का स्थान है।
दूसरा कारण: सोने की झाड़ू विनम्रता का प्रतीक
सोने की झाड़ू पहली नजर में राजसी शान का प्रतीक दिखाई देती है, लेकिन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसका वास्तविक अर्थ विनम्रता और सेवा भाव से जुड़ा है। लाखों श्रद्धालुओं के सामने राजा का स्वयं झाड़ू लगाना यह संदेश देता है कि सच्ची महानता अहंकार में नहीं, बल्कि सेवा और समर्पण में होती है।
तीसरा कारण: शुभता और समानता का संदेश
सनातन परंपरा में सोना पवित्रता, शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसी कारण भगवान के मार्ग की सेवा के लिए सोने के हत्थे वाली झाड़ू का उपयोग किया जाता है। यह परंपरा समानता का भी संदेश देती है, क्योंकि मार्ग की सफाई के बाद किसी भी जाति, वर्ग या समुदाय का भेदभाव नहीं रहता और सभी श्रद्धालु एक साथ भगवान के रथ की रस्सियां खींचकर यात्रा में सहभागी बनते हैं।
धार्मिक परंपरा के साथ सामाजिक संदेश भी
जगन्नाथ रथ यात्रा केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं मानी जाती, बल्कि यह सेवा, विनम्रता, सामाजिक समानता और सामूहिक एकता का भी प्रतीक है। ‘छेरा पहंरा’ की परंपरा इसी संदेश को पीढ़ियों से आगे बढ़ाती आ रही है और श्रद्धालुओं को यह सिखाती है कि ईश्वर के समक्ष सभी समान हैं।
