अंतरिक्ष में इस समय हजारों सैटेलाइट पृथ्वी की कक्षा में सक्रिय हैं, जो मौसम की निगरानी, ग्रीनहाउस गैसों के अध्ययन, संचार सेवाओं और दूरस्थ तारों के शोध जैसे महत्वपूर्ण काम करते हैं। लेकिन हर मशीन की तरह सैटेलाइट भी हमेशा के लिए काम नहीं करते। समय के साथ वे पुराने हो जाते हैं या तकनीकी रूप से निष्क्रिय हो जाते हैं। ऐसे में एक बड़ा सवाल यह उठता है कि जब सैटेलाइट अपना काम बंद कर देते हैं तो उनके साथ आखिर क्या किया जाता है।
पुराने सैटेलाइट को हटाने के दो मुख्य तरीके
अंतरिक्ष वैज्ञानिक आम तौर पर सैटेलाइट को हटाने के लिए दो प्रमुख तरीकों का उपयोग करते हैं और यह इस बात पर निर्भर करता है कि सैटेलाइट पृथ्वी से कितनी ऊंचाई पर स्थित है। कम ऊंचाई वाली कक्षाओं में मौजूद सैटेलाइट के लिए इंजीनियर उसमें बचे हुए ईंधन का उपयोग करके उसकी गति कम कर देते हैं। जैसे ही उसकी गति कम होती है, वह धीरे-धीरे पृथ्वी की ओर खिसकता है और अंततः वायुमंडल में प्रवेश कर जाता है। पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते समय हवा के घर्षण से अत्यधिक गर्मी पैदा होती है, जिससे सैटेलाइट जलकर नष्ट हो जाता है। छोटे सैटेलाइट के लिए यह तरीका सुरक्षित माना जाता है क्योंकि उनका मलबा आमतौर पर जमीन तक नहीं पहुंचता। हालांकि बड़े अंतरिक्ष यान या स्पेस स्टेशन पूरी तरह नहीं जल पाते, इसलिए उन्हें नियंत्रित तरीके से पृथ्वी पर गिराया जाता है।
प्रशांत महासागर में है अंतरिक्ष यानों का ‘कब्रिस्तान’
बड़े अंतरिक्ष यानों और सैटेलाइट के मलबे को सुरक्षित रूप से गिराने के लिए वैज्ञानिकों ने प्रशांत महासागर में एक विशेष क्षेत्र तय किया है। इस इलाके को ‘स्पेसक्राफ्ट कब्रिस्तान’ या अंतरिक्ष यानों का कब्रिस्तान कहा जाता है। यह क्षेत्र पॉइंट निमो के आसपास स्थित है, जो पृथ्वी का सबसे दूरस्थ समुद्री इलाका माना जाता है। यहां से नजदीकी जमीन की दूरी लगभग 2600 किलोमीटर से अधिक है और यह न्यूजीलैंड से भी हजारों किलोमीटर दूर है। इसी वजह से यहां जहाजों की आवाजाही बहुत कम होती है और मलबा गिरने से किसी तरह का खतरा नहीं होता। अतीत में कई बड़े अंतरिक्ष स्टेशन और यान इसी क्षेत्र में नियंत्रित तरीके से गिराए जा चुके हैं।
ग्रेवयार्ड ऑर्बिट में भेजे जाते हैं ऊंची कक्षा के सैटेलाइट
जो सैटेलाइट पृथ्वी से बहुत अधिक ऊंचाई वाली कक्षाओं में होते हैं, उन्हें वापस पृथ्वी पर लाने में काफी ज्यादा ईंधन की जरूरत पड़ती है। ऐसे में वैज्ञानिक एक अलग तरीका अपनाते हैं। इन सैटेलाइट को उनकी मूल कक्षा से और ऊपर एक विशेष कक्षा में भेज दिया जाता है, जिसे ‘ग्रेवयार्ड ऑर्बिट’ या कब्रिस्तान कक्षा कहा जाता है। यह कक्षा सामान्य जियोस्टेशनरी कक्षा से लगभग 200 से 300 किलोमीटर या उससे अधिक ऊपर स्थित होती है और पृथ्वी से इसकी ऊंचाई लगभग 36 हजार किलोमीटर से भी ज्यादा होती है। यहां भेजे गए सैटेलाइट सक्रिय उपग्रहों से दूर रहते हैं और टकराव का खतरा कम हो जाता है। कई निष्क्रिय सैटेलाइट इस कक्षा में हजारों वर्षों तक घूमते रह सकते हैं।
पुराने सैटेलाइट हटाना क्यों जरूरी है
अंतरिक्ष में पुराने सैटेलाइट को हटाना इसलिए भी जरूरी माना जाता है क्योंकि पृथ्वी की कक्षा में पहले से ही बड़ी संख्या में सक्रिय सैटेलाइट मौजूद हैं। इसके अलावा लाखों छोटे-बड़े मलबे के टुकड़े भी अंतरिक्ष में तैर रहे हैं। यदि इनमें से कोई टुकड़ा किसी सक्रिय सैटेलाइट या अंतरिक्ष यान से टकरा जाए तो और अधिक मलबा पैदा हो सकता है। इस तरह की लगातार टक्करों से मलबे की संख्या तेजी से बढ़ सकती है, जिसे वैज्ञानिक ‘केसलर सिंड्रोम’ या ‘केसलर प्रभाव’ कहते हैं। यदि यह स्थिति गंभीर हो जाए तो पृथ्वी की कुछ कक्षाएं इस्तेमाल के लायक नहीं रह जाएंगी और संचार, जीपीएस तथा मौसम पूर्वानुमान जैसी महत्वपूर्ण सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।
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