45 साल तक क्यों छिपाते रहे अपना दाहिना हाथ? हमले से लेकर सुप्रीम लीडर बनने तक अयातुल्लाह अली खामेनेई की पूरी कहानी

अमेरिका और इजरायल के हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के मारे जाने की खबर के बाद खाड़ी क्षेत्र में तनाव चरम पर है। पश्चिम एशिया की सियासत में इस घटनाक्रम ने बड़ा भूचाल ला दिया है। तीन दशक से अधिक समय तक ईरान की सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाए रखने वाले खामेनेई अब इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं। उनकी मौत के साथ ही उनके कठोर शासन, विवादों और निजी जीवन के कई पहलुओं पर नई बहस छिड़ गई है, जिनमें 45 वर्षों तक दाहिना हाथ छिपाकर रखने का रहस्य भी शामिल है।

1981 का वो हमला जिसने बदल दी जिंदगी

खामेनेई ने 1989 में अयातुल्लाह रूहोल्ला खोमैनी की मृत्यु के बाद सुप्रीम लीडर की जिम्मेदारी संभाली थी। लेकिन इससे आठ साल पहले, 1981 में, उन पर जानलेवा हमला हुआ था। उस समय वे ईरान के राष्ट्रपति थे और ईरान-इराक युद्ध के दौरान एक कार्यक्रम में नमाज के बाद लोगों के सवालों का जवाब दे रहे थे। तभी एक घुंघराले बालों वाला व्यक्ति उनकी मेज पर टेप रिकॉर्डर रखकर चला गया। कुछ ही देर में वह रिकॉर्डर विस्फोट के साथ फट गया।

हमले की जिम्मेदारी फुरकान ग्रुप ने ली थी। एक संदेश छोड़ा गया था, जिसमें इसे इस्लामिक रिपब्लिक के लिए ‘तोहफा’ बताया गया। धमाके में खामेनेई गंभीर रूप से घायल हुए और कई महीनों तक अस्पताल में भर्ती रहे।

हमले में बेकार हुआ दाहिना हाथ

इस विस्फोट में उनका दाहिना हाथ बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया और उसमें लकवा मार गया। यही वजह रही कि सार्वजनिक जीवन में उन्होंने दशकों तक अपना दाहिना हाथ छिपाकर रखा। वे शपथ या सार्वजनिक अभिवादन के दौरान हमेशा बायां हाथ ही उठाते थे। हमले के बाद उन्होंने कहा था, “मुझे एक हाथ की जरूरत नहीं है। अगर मेरा दिमाग और जुबान काम करते रहें, तो यह कमी पूरी हो जाएगी।”

क्रांति से सत्ता के शिखर तक का सफर

1939 में ईरान के उत्तर-पूर्वी शहर मरशद में जन्मे खामेनेई ने नजफ और क़ुम के इस्लामी मदरसों में शिक्षा हासिल की। किशोरावस्था में ही उन्होंने क्रांतिकारी इस्लाम के विचारों को अपनाना शुरू कर दिया था। 1958 में उनकी मुलाकात खोमैनी से हुई और वे उनकी विचारधारा ‘खोमैनीवाद’ के समर्थक बन गए। इस विचारधारा का मूल सिद्धांत ‘विलायत-ए-फकीह’ था, जिसके तहत सर्वोच्च नेता को व्यापक धार्मिक और राजनीतिक अधिकार प्राप्त होते हैं।

1960 के दशक से उन्होंने शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। 1971 में शाह की गुप्त पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर यातनाएं दीं। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद खोमैनी निर्वासन से लौटे और सर्वोच्च नेता बने, जबकि खामेनेई को क्रांतिकारी परिषद में जगह मिली। बाद में वे उप रक्षा मंत्री बने और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर के संगठन में भी अहम भूमिका निभाई।

1981 में हत्या के प्रयास से बचने के बाद वे 1982 में राष्ट्रपति चुने गए और 1985 में दोबारा निर्वाचित हुए। उनका अधिकांश राष्ट्रपति कार्यकाल ईरान-इराक युद्ध के दौरान बीता। इस दौरान उन्होंने आईआरजीसी के साथ मजबूत संबंध स्थापित किए।

सुप्रीम लीडर बनने का विवादित फैसला

जून 1989 में खोमैनी की मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी को लेकर अनिश्चितता थी। शुरू में ग्रैंड अयातुल्ला हुसैन अली मोंतज़ेरी को उत्तराधिकारी माना गया था, लेकिन बाद में उन्हें नजरबंद कर दिया गया। विशेषज्ञों की सभा ने खामेनेई को सुप्रीम लीडर चुना, जिसे कई धर्मगुरुओं ने चौंकाने वाला फैसला बताया। आलोचकों का कहना था कि उनके पास ‘ग्रैंड अयातुल्ला’ का दर्जा नहीं था, जो संवैधानिक रूप से अपेक्षित माना जाता था।

जुलाई 1989 में संविधान संशोधन के लिए जनमत संग्रह कराया गया। संशोधन के बाद सर्वोच्च नेता बनने की शर्तों में बदलाव हुआ और खामेनेई को अयातुल्ला का दर्जा दिया गया। इसके साथ ही उन्हें नीतियां तय करने, संरक्षक परिषद के सदस्यों की नियुक्ति करने और जनमत संग्रह कराने जैसे व्यापक अधिकार मिल गए।

तीन दशक से अधिक समय तक कड़ा नियंत्रण

36 वर्षों तक सर्वोच्च नेता रहते हुए खामेनेई ने ईरान की घरेलू राजनीति पर सख्त नियंत्रण बनाए रखा। आंतरिक विरोध को कठोरता से दबाया गया। दिसंबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच हुए जनआंदोलन को भी उनकी सरकार ने सख्ती से कुचला, जिसमें हजारों लोगों की मौत हुई। हाल के वर्षों में सत्ता बनाए रखना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता मानी गई।

आज उनकी मौत के बाद ईरान ही नहीं, पूरे पश्चिम एशिया की राजनीति नए मोड़ पर खड़ी है। एक ऐसा नेता, जिसने क्रांति के बाद के ईरान को आकार दिया और दशकों तक निर्णायक भूमिका निभाई, अब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुका है।

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